भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १४९ जायगा—भगवान्‌को नहीं भजेगा, उसे मनुष्य-जीवनके परम लाभसे वञ्चित होकर बड़ी हानि सहनी पड़ेगी) ॥४४४॥ समयका महत्त्व सिंधु तरन कपि गिरि हरन काज साईँ हित दोउ । तुलसी समयहिं सब बड़ो बूझत कहूँ कोउ कोउ ॥४४५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—समयपर काम करनेसे ही सब बड़े होते हैं, इस रहस्यको कहीं कोई-कोई ही जानते हैं। श्रीहनुमान्‌जीने [सीताका संदेश लानेके लिये] समुद्रको लांघना और [ श्रीलक्ष्मणजीकी मूर्च्छा दूर करनेके लिये ] द्रोण-पर्वतको लाना—ये दोनों काम अपने स्वामीके हितके लिये ठीक समयपर ही किये थे। (समुद्र लांघना और पहाड़ उठाना हनुमान्‌जीके लिये साधारण बात थी, परंतु ठीक समयपर होनेसे ही इनकी इतनी महिमा हुई।) ॥ ४४५ ॥ तुलसी मीठी अमी तें मागी मिलै जो मीच । सुधा सुधाकर समय बिनु कालकूट तें नीच ॥४४६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि समयपर (जिस समय मनुष्य दुःखसे सन्तप्त होकर घबड़ा उठता है) माँगनेसे मौत भी मिल जाय तो वह अमृतसे अधिक मीठी मालूम होती है। परंतु बिना अवसरके अमृत या चन्द्रमा भी मिलें तो वे कालकूट जहरसे भी अधिक बुरे लगते हैं॥४४६॥ विपत्तिकालके मित्र कौन हैं? तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक । साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो एक ॥४४७॥