दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि धीरज, धर्म, विवेक, सत्- साहित्य, साहस और सत्यका व्रत अथवा एकमात्र श्रीरामका भरोसा— बुरे समयके (विपत्तिकालके) यही मित्र हैं ॥४४७॥ समरथ कोउ न राम सो तीय हरन अपराधु । समयहिं साधे काज सब समय सराहहिं साधु ॥४४८॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समान तो कोई सामर्थ्य- वान् नहीं (जो होनी-अनहोनी सब कुछ कर सकते हैं) और सीताहरणके समान भयंकर, अपराध कोई क्या करेगा। इसपर भी श्रीरामजीने उस समय रावणको न मारकर उचित समयपर ही सब काम किये। इसीलिये साधुलोग समयकी सराहना करते हैं ॥४४८॥ तुलसी तीरहु के चलें समय पाइबी थाह । धाइ न जाइ थहाइबो सर सरिता अवगाह ॥४४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नदी या सरोवरके किनारे- किनारे चलनेसे ही समयपर उनकी थाह मिल जायगी; अगाध तालाब या नदियोंकी थाह लेनेके लिये दौड़कर उनके अंदर घुस नहीं जाना चाहिये (समयकी प्रतीक्षा करनी चाहिये) ॥४४९॥ होनहारकी प्रबलता तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ । आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहाँ लै जाइ ॥४५०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जैसी होनहार होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह स्वयं उसके पास आती है या उसे वहाँ ले जाती है ॥४५०॥