दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १५१ परमार्थप्राप्तिके चार उपाय कै जूझिबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस । चारि चारु परलोक पथ जथा जोग उपदेस ॥४५१॥ भावार्थ—परलोकके लिये सुन्दर चार मार्ग हैं और [अधिकार- भेदसे] इनका यथायोग्य उपदेश किया गया है—[वेदाध्ययनादिके द्वारा] ज्ञान अर्जन करना (ब्राह्मणके लिये), [सम्मुख समर- में] युद्ध करना (क्षत्रियके लिये), [व्यापारमें धन कमाकर] दान देना (वैश्यके लिये) और शरीरसे कष्ट सहकर सेवा करना (शूद्रके लिये) ॥४५१॥ विवेककी आवश्यकता पात पात को सींचिबो न करु सरग तरु हेत । कुटिल कटुक फर फरैंगो तुलसी करत अचेत ॥४५२॥ भावार्थ—कल्पवृक्ष [से फल] पानेके लिये पत्ते-पत्तेको (हर किसी पेड़को) मत सींचा करो, ऐसा करोगे तो ऐसा टेढ़ा और कड़ुआ फल फलेगा जो तुमको अचेत कर देगा (अर्थात् परम सुखरूप मनोरथकी पूर्तिके लिये बिना समझे-सोचे जैसे-तैसे कर्म मत किया करो; ऐसा करनेसे सुख तो मिलेगा ही नहीं, उल्टे बुरे कर्मोंके फलस्वरूप महान् दुःखोंकी प्राप्ति होगी, जिससे रहा-सहा विवेक भी नष्ट हो जायगा) ॥४५२॥ विश्वासकी महिमा गठिबँध ते परतीति बड़ि जेंहिं सबको सब काज । कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज ॥४५३॥ भावार्थ—गठबन्धनसे भी विश्वास बड़ा है, जिससे सब लोगों- के सब काम होते हैं। कहनेमें सब बात छोटी-सी है, परंतु