दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ दोहावली समझनेसे बहुत बड़ी है। जिस प्रकार अनाजके थोड़े-से दाने मिट्टीमें गाड़ दिये जाते हैं, परंतु वही अनाज पैदा होनेपर बहुत बढ़ जाता है ॥४५३॥ अपनो ऐपन निज हथा लिय पूजहिं निज भीति। फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति ॥४५४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि स्त्रियाँ अपने घरकी दीवारपर अपने ऐपनके (चावल और हल्दीको एक साथ पीसकर बनाये हुए रंगके) अपने ही हाथे छापकर उनको पूजती हैं और उसीसे उनकी सारी मनः कामनाएँ पूरी हो जाती हैं। यह प्रेम और विश्वासका ही फल है ॥४५४॥ बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु। तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु ॥४५५॥ भावार्थ—सूर्य स्वयं [पृथ्वीपर अपार] जल बरसाता है और सोखता है, परंतु लोगोंके दिये हुए अर्घ्य (थोड़े-से जल) से बड़ा प्रसन्न होता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि साधु और देवता सब स्नेह और सम्मान ही चाहते हैं ॥४५५॥ बारह नक्षत्र व्यापारके लिये अच्छे हैं श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हय रेवती सखाउ। देहि लेहि धन धरनि धरु गएहुँ न जाइहि काउ ॥४५६॥ भावार्थ—श्रवणनक्षत्रसे तीन नक्षत्र (श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष), हस्त नक्षत्रसे तीन नक्षत्र (हस्त, चित्रा, स्वाती), 'पु' से आरम्भ होनेवाले दो नक्षत्र (पुष्य, पुनर्वसु) और मृगशिरा, अश्विनी, रेवती तथा अनुराधा—इन बारह नक्षत्रोंमें धन, जमीन और धरोहरका