दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १५३ लेन-देन करो; ऐसा करनेसे धन जाता हुआ प्रतीत होनेपर भी नहीं जायगा ॥ ४५६ ॥ चौदह नक्षत्रोंमें हाथसे गया हुआ धन वापस नहीं मिलता ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ । हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ ॥४५७॥ भावार्थ—'उ'से आरम्भ होनेवाले तीन नक्षत्र (उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद), 'पू'से आरम्भ होनेवाले तीन नक्षत्र (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद), वि (विशाखा), अज (रोहिणी), कृ (कृत्तिका), म (मघा), आ (आर्द्रा)' भ (भरणी), अ (अश्लेषा) और मू (मूल) को भी इन्हींके साथ समझ लो—इन चौदह नक्षत्रोंमें हरा हुआ (चोरी गया हुआ), धरोहर रखा हुआ, गाड़ा हुआ तथा उधार दिया हुआ धन फिर लौटकर हाथ नहीं आता ॥ ४५७ ॥ कौन-सी तिथियाँ कब हानिकारक होती हैं रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि*प्रथमादिक बार । तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार ॥४५८॥ भावार्थ—द्वादशी, एकादशी, दशमी, तृतीया, षष्ठी, द्वितीया, सप्तमी—ये सातों तिथियाँ यदि क्रमसे रवि, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनिवारको पड़ें तो ये सब कामोंको बिगाड़ने- वाली होती हैं और यह कुयोग समझा जाता है ॥ ४५८ ॥ *रवि बारह, हर (रुद्र) ग्यारह, दिशाएँ दश, गुण तीन, रस छः, नेत्र दो और ऋषि-मुनि सात हैं। इन्हींसे तिथियोंका वर्णन है।