भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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१५४ दोहावली कौन-सा चन्द्रमा घातक समझना चाहिये ? ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु । * मेषादिक क्रम तें गनहि घात चंद्र जियँ जानु ॥४५९॥ भावार्थ—मेषके प्रथम, वृषके पाँचवें, मिथुनके नवें, कर्कके दूसरे, सिंहके छठे, कन्याके दसवें, तुलाके तीसरे, वृश्चिकके सातवें, धनके चौथे, मकरके आठवें, कुम्भके ग्यारहवें और मीन राशिके बारहवें चन्द्रमा पड़ जायें तो उसे घातक समझो ॥ ४५९ ॥ किन-किन वस्तुओंका दर्शन शुभ है ? नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चक चाष । दस दिसि देखत सगुन सुभ पूजहिं मन अभिलाष ॥४६०॥ भावार्थ—नेवला, मछली, दर्पण, क्षेमकरी चिड़िया (सफेद मुँहवाली चील्ह), चकवा तथा नीलकंठ—इन्हें दसों दिशाओंमेंसे किसी ओर भी देखना शुभ शकुन है और इससे मनकी अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं ॥ ४६० ॥ सात वस्तुएँ सदा मंगलकारी हैं ? सुधा साधु सुरतरु सुमन सुफल सुहावनि बात । तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात ॥४६१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अमृत, साधु, कल्पवृक्ष, पुष्प, सुन्दर फल, सुहावनी बात और श्रीजानकीनाथजीकी भक्ति—ये सात सुन्दर मङ्गलकारी शकुन हैं ॥ ४६१ ॥ श्रीरघुनाथजीका स्मरण सारे मंगलोंकी जड़ है भरत सत्रुसूदन लखन सहित सुमिरि रघुनाथ । करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ ॥४६२॥

  • शशि—चन्द्रमा एक, सर—बाण पाँच, फल चार, वसु आठ होते हैं ।