दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 159, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १५५ भावार्थ—भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके सब शुभ साधनोंके द्वारा कार्य करो तो साथ-ही-साथ सुन्दर मङ्गल भी मिलता जायगा (अर्थात् मनोरथ सफल होते जायेंगे) ॥ ४६२ ॥ यात्राके समयका शुभ स्मरण राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान । लछि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान ॥४६३॥ भावार्थ—श्रीविश्वामित्रजीसहित श्रीरामलक्ष्मणका स्मरण करके यात्रा करो और लक्ष्मीका लाभ लेकर जगत्में यश लो। यह शकुन सच्चा मङ्गलमय है ॥ ४६३ ॥ वेदकी अपार महिमा अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार । जो निंदत निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥४६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विचार करनेपर यही सिद्ध होता है कि वेदकी महिमा अतुलनीय है, जिसकी निन्दा करनेसे स्वयं भगवान्का बुद्धावतार भी निन्दित हो गया, यह सबको विदित है ॥ ४६४ ॥ बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच । तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच ॥४६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि पण्डितगण किसान हैं और वेद सरोवर है, इसीसे जल ले-लेकर सब अपने-अपने मतरूपी खेतको सींचते हैं, इनमें कौन-सा खेत [मत] उत्तम है और कौन-सा मध्यम या नीच है, इसका पता खेती [उत्तम, मध्यम और नीच फल और विस्तार] देखकर लगाना चाहिएं ॥ ४६५ ॥