दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ दोहावली धर्मका परित्याग किसी भी हालतमें नहीं करना चाहिये सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान । तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान ॥४६६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बुरे वचनोंको और सब प्रकारके कष्टोंको सह लो तथा मिथ्या अपमानको भी अङ्गीकार कर लो, परंतु धर्मको मत छोड़ो। श्रेष्ठ बुद्धिमान् पुरुष ऐसा ही उपदेश और आचरण कर गये हैं ॥ ४६६ ॥ दूसरेका हित ही करना चाहिए, अहित नहीं अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि । तुलसी चारु बिचारु भल करिअ काज सुनि जानि ॥४६७॥ भावार्थ—दूसरेका हित करनेमें तो अपने अहितका केवल भय ही रहता है; परंतु दूसरेका अहित करनेमें अपने हितका नाश होता ही है। इसलिये तुलसीदासजी कहते हैं कि यहाँ यही विचार सुन्दर और मङ्गलकारक है कि जान-सुनकर (सोच-समझकर) काम करना चाहिये (पराये हितका ही काम करना चाहिये