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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १५७ नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक। तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक ॥४६९॥ भावार्थ—नीतिपथपर चलना और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेमका निबाहना (अटूट प्रेम करना) ही उत्तम है। तुलसीदासजी कहते हैं कि वस्त्र वही पहनना चाहिये, जिसका रंग धोनेपर भी फीका न पड़े ॥४६९॥ दोहा चारु बिचारु चलु परिहरि बाद बिबाद। सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद ॥४७०॥ भावार्थ—उपर्युक्त दोहेको अच्छी तरह विचार लो (अर्थात् नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम कभी न छोड़ो) [अथवा वाद-विवाद छोड़कर दो 'हा' अर्थात् हाहा खाना—सबसे विनीत रहना ही सुन्दर विचार है] और वाद-विवाद छोड़कर चलो, [चाहे कोई कुछ भी कहे]। बस, यही पुण्यकी सीमा है, यही स्वार्थ- की अवधि है और यही परमार्थकी—भगवत्प्राप्तिकी मर्यादा है ॥४७०॥ विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान। जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान ॥४७१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि वही पुरुष सामर्थ्यवान्, बुद्धिमान्, पुण्यात्मा, साधु और चतुर है जो आयके अनुमानसे ही व्यय करता है और जगत्में विचारपूर्वक व्यवहार करता है ॥४७१॥

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