भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१५८ दोहावली जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि। बिनुअपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर लाखि ॥४७२॥ भावार्थ—जगत्‌में योगकी (अर्थात् प्राप्त हुए धन, ऐश्वर्य, शक्ति या अधिकारकी) रक्षा किये बिना अर्थात् उसका सदुपयोग न करके दुरुपयोग करनेसे वह नष्ट हो जाता है। [जिनके प्रति दुरुपयोग होता है उनका तो कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि] तुलसी दासके हितैषी श्रीरामजी निरपराधोंकी रक्षा करते ही हैं। इसमें परशुराम, नहुष, वेन और वृकासुर (भस्मासुर) साक्षी हैं। (परशु- रामजीने अपने बलका क्षत्रियोंके नाशमें दुरुपयोग किया; परन्तु अन्तमें क्षत्रियवंश बच गया और परशुरामजीका बल क्षत्रियशरीरधारी भगवान् श्रीरामजीद्वारा हरा गया। राजा नहुषको पुण्यबलसे जब इन्द्रका सिंहासन प्राप्त हुआ, तब इन्द्रपत्नी शचीके साथ सम्भोगकी इच्छा करके नहुषने अधिकारका दुरुपयोग किया, जिसके फलस्वरूप सप्तर्षियोंके शापसे उनको स्वर्गसे गिरना पड़ा और निरपराध शचीके सतीत्वकी रक्षा हो गयी। वेनने अपने अधिकारका दुरुपयोग करके धर्मका नाश करना आरम्भ किया; परन्तु धर्म तो नष्ट नहीं हुआ; ऋषियोंके शापसे स्वयं वेनको ही मरना पड़ा। वृकासुर (भस्मासुर) शिवजीसे वरदान पाकर ऐसा बौराया कि उसने अपने वरदाता शिवजीको ही जला देना चाहा। अन्तमें भगवान् विष्णुकी चतुराईसे वह स्वयं जल गया) ॥४७२॥ नेमसे प्रेम बड़ा है बड़ि प्रतीति गठबंधन तें बड़ो जोग तें छेम। बड़ो सुसेवक साईं तें बड़ो नेम तें प्रेम ॥४७३॥ भावार्थ—बाहरी ग्रन्थि-बन्धनकी अपेक्षा विश्वास बड़ा है। योग-