भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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से क्षेम बड़ा है। स्वामीकी अपेक्षा श्रेष्ठ सेवक बड़ा है और नियमोंसे प्रेम बड़ा है ॥४७३॥

किस-किसका परित्याग कर देना चाहिये

सिष्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच। सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच ॥४७४॥ भावार्थ—यदि यह बात सुननेमें आवे कि अपना शिष्य, मित्र, नौकर, मन्त्री और सुन्दरी स्त्री—ये पाँचों मुझको छोड़कर दूसरेके मनको प्रसन्न करने लगे हैं तो पहले तो इसकी जाँच करनी चाहिये और [जाँच करनेपर यदि बात सत्य निकले तो] फिर इन्हें छोड़ देना चाहिये ॥४७४॥

सात वस्तुओंको रस बिगड़नेसे पहले ही

छोड़ देना चाहिये

नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार। सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार ॥४७५॥ भावार्थ—नगर, स्त्री, भोजन, मन्त्री, सेवक, मित्र और घर— इनकी सरसता नष्ट होनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देनेमें शोभा और आनन्द है। नीरस होनेपर इनका त्याग करनेमें तो शोक और अशान्ति ही होती है ॥४७५॥

मनके चार कण्टक हैं

तूठहिं निज रुचि काज करि रूठहिं काज बिगारि। तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि ॥४७६॥ भावार्थ—स्त्री, पुत्र, सेवक और मित्र जब अपनी रुचिके अनु- सार कार्य करनेमें ही सन्तुष्ट होते हैं (अपनी रुचिके प्रतिकूल किसीकी १