भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१६० दोहावली बात नहीं सुनते) और मनमानी करके आप ही काम बिगाड़ लेते हैं तथा फिर रूठ भी जाते हैं, तब ये चारों मनको काँटेके समान चुभने लगते हैं ॥४७६॥ कौन निरादर पाते हैं ? दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग। तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग ॥४७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि प्राणके समान प्यारे होने- पर भी बहुत दिनोंके रोगी, दरिद्र, कटु वचन बोलनेवाले और लालची—ये चारों निरादरके योग्य हो जाते हैं ॥४७७॥ पाँच दुःखदायी होते हैं पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत। बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत ॥४७८॥ भावार्थ—पाही खेती (जिस गाँवमें रहते हों उससे दूर जाकर दूसरे गांवमें खेती करना), राह चलते मनुष्यमें आसक्ति, बुरे, (बहुत अधिक) ब्याजकी कर्जदारी, रास्तेपरका खेत और अपनी अपेक्षा बड़ेसे वैर—ये पाँचों काम करनेसे ( अवश्य ही ) दुःखके कारण होते हैं ॥४७८॥ समर्थ पापीसे वैर करना उचित नहीं धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु। समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु ॥४७९॥