दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभावार्थ—जिस तरह लोहा चावसे दौड़कर चुम्बकसे लग जाता है, उसी तरह नीच मनुष्य [कपटभरी] नम्रता प्रदर्शित कर खींच लेता है। इसी प्रकार समर्थ पापीसे बैर करनेको खरीदी हुई मौत समझो ॥ ४७९ ॥ सोचनीय कौन है सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥४८०॥ भावार्थ—वह गृहस्थ सोचनीय है, जो मोहवश शास्त्रोक्त कर्म- मार्गका त्याग कर देता है और वह संन्यासी सोचनीय है जो संसारमें आसक्त और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ॥ ४८० ॥ परमार्थसे विमुख ही अंधा तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि। अंध कहें दुख पाइहैं डिठिआरो केहि डीठि ॥४८१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य स्वार्थके तो (सम्मुख) शरण हो रहा है और परमार्थकी ओर जिसने पीठ कर रक्खी है (अर्थात् भगवान्से विमुख होकर जो केवल विषयोंमें रत है) वह अन्धा कहनेपर तो मनमें दुःख पायेगा, परंतु किस आँख- को लेकर उसे आँखवाला कहा जाय ? (अर्थात् आँख हुए बिना उसे आँखवाला कहें भी कैसे ? हृदयमें विवेकरूपी असली आँख होती तो वह भगवान्के सम्मुख होनेमें ही अपना कल्याण देखता और भयंकर विषयोंका मोह छोड़ देता) ॥ ४८१ ॥ दोहा० ११-१२—