भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१६२ दोहावली मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय। चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय ॥४८२॥ भावार्थ—विना आँखवाली जूती पैरको देखकर पहचान लेती है; किंतु इन नर-नारियोंके चार-चार आँखें (दो बाहरकी और मन- बुद्धिरूप दो भीतरकी) होनेपर भी इन्हें मौत और माया नहीं सूझती ! ॥ ४८२ ॥ मूढ़ उपदेश नहीं सुनते जौ पै मूढ़ उपदेश के होते जोग जहान। क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान ॥४८३॥ भावार्थ—यदि मूर्ख मनुष्य संसारमें उपदेशके योग्य होते तो परम चतुर भगवान् श्रीकृष्ण दुर्योधनको क्यों न समझा सके ? ॥ ४८३ ॥ सोरठा फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥४८४॥ भावार्थ—यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं तो भी बेंत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार यदि ब्रह्माके समान भी [ज्ञानी] गुरु मिल जायँ तो भी मूर्खके हृदयमें ज्ञान नहीं होता ॥ ४८४ ॥ दोहा रीझि आपनी बूझि पर खीझि बिचार बिहीन। ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन ॥४८५॥. CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri