भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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भावार्थ—अपनी ही समझ (बुद्धि) पर जिनकी प्रीति है (अपनी ही समझको जो सबसे उत्तम मानते हैं) और जिनका रोष नासमझीको लिये हुए होता है; वे मोहके महान् समुद्रमें मछली बने हुए लोग किसीका उपदेश नहीं मानते ॥ ४८५ ॥ बार-बार सोचनेकी आवश्यकता अनसमझें अनुसोचनो अवसि समुझिए आपु । तुलसी आपु न समुझिए पल पल पर परितापु ॥४८६॥ भावार्थ—किसी बातको न समझनेपर उसे बार-बार सोचना चाहिये, ऐसा करनेसे वह बात अपने-आप समझमें आ जायगी। तुलसीदासजी कहते हैं कि वह स्वयं समझमें नहीं आयी तो [उसके अनुसार आचरण करनेसे] क्षण-क्षणमें दुःख होगा ॥ ४८६ ॥ मूर्खशिरोमणि कौन हैं ? कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर । बवाँहि नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर ॥४८७॥ भावार्थ—जो लोग घर जलनेपर कुँआ खोदते हैं, शत्रुके चढ़ आनेपर [किले की रक्षाके लिये चारों ओर] बबूलके वृक्ष रोपना शुरू करते हैं और स्वार्थसाधनके लिये [भगवान्‌को छोड़कर जहाँ-तहाँ] सिर नवाते फिरते हैं, वे मूर्खोंके शिरोमणि और निकम्मे (दीर्घसूत्री और प्रमादी) हैं ॥ ४८७ ॥ ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है निडर ईस तें बीस कें बीस बाहु सो होइ । गयो गयो कहँ सुमति सब भयो कुमति कह कोइ ॥४८८॥