दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ दोहावली भावार्थ—ईश्वरका डर छोड़कर चाहे कोई बीसों विस्वे (निश्चय ही) रावणके समान [प्रभावशाली] क्यों न हो जाय, बुद्धिमान् लोग तो उस ईश्वरविमुखको गया-गया ही (नष्ट ही हुआ) कहेंगे; कोई कुबुद्धिवाला ही उसे उन्नतिको प्राप्त हुआ बतलावेगा ॥ ४८८ ॥ जान-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ है जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहै जु सोइ । उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होइ ॥४८९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो [सब बात] सुन- समझकर भी (जान-बूझकर) अनीतिमें लगा रहता है और जागते हुए भी सो रहता है, उसको उपदेश देना या जगाना उचित नहीं है अर्थात् व्यर्थ है ॥ ४८९ ॥ बहु सुत बहु रुचि बहु बचन बहु अचार व्यवहार । इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार ॥४९०॥ भावार्थ—जिनके बहुत पुत्र हों, जिनकी [भाँति-भाँतिकी] अनेकों इच्छाएँ हों, जो तरह-तरहकी बातें बनाते हों, जिनके आचरण और व्यवहार अनेकों प्रकारके हों उनकी भलाई चाहना महान् मूर्खता है (अर्थात् उनका कल्याण होना बहुत ही कठिन है) ॥ ४९० ॥ जगत्के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस । करत गगन को गँडुआ सो सठ तुलसीदास ॥४९१॥