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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो आदमी [दूसरोंके द्वारा] अपना भला होनेकी आशासे [भगवान्को छोड़कर जगत्के] लोगोंको रिझाता रहता है, वह मूर्ख आकाशका तकिया बनाना चाहता है ॥४९१॥ अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह । तुलसी लोग रिझाइबो करषि कातिबो नान्ह ॥४९२॥ भावार्थ—क्या श्रीजानकीजी अपयशके योग्य थीं और क्या श्रीकृष्णने मणिकी चोरी की थी ? कदापि नहीं। अतएव तुलसी- दासजी कहते हैं कि सब लोगोंको प्रसन्न करना उतना ही कठिन है जितना जोरसे खींचकर बारीक सूत कातना ! ॥४९२॥ तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ । तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रघुराउ ॥४९३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि लोगोंके सन्देहको दूर करनेका कोई उपाय होता तो क्या श्री रघुनाथजी श्रीजानकीजी- को अपने मनमें [सर्वथा निष्कलङ्क] जानते हुए भी उनका त्याग करते ? ॥४९३॥ प्रतिष्ठा दुःखका मूल है मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि । पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बढ़ी रारि ॥४९४॥ भावार्थ—जबतक मधुकरी माँगकर खाते थे, तबतक पैर पसार- कर (निश्चिन्त रूपसे) सोते थे । परन्तु इधर यह पापमयी प्रतिष्ठा बढ़ गयी, इसीसे झगड़ा (झंझट) भी बढ़ गया ॥४९४॥ तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान । उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान ॥४९५॥

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