दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मूर्ख जनताका सम्मान भेड़ियाधँसानके समान है (जहाँ एकने बड़ाई की, वहीं सब करने लगते हैं) परन्तु इस सम्मानका मिलना शुरू होते ही अभिमान उत्पन्न हो जाता है, जिससे मूर्खलोग अपनी स्थिति खो बैठते हैं (अभिमानके वश होकर गिर जाते हैं) ॥४९५॥ भेड़ियाधँसानका उदाहरण लही आँखि कब आँधरें बाँझ पूत कब ल्याइ । कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ ॥४९६॥ भावार्थ—दुनिया बहराइचको दौड़ी जाती है, परन्तु कोई इस बातका पता नहीं लगाता कि वहाँ जाकर कब किस अंधेने आंख पायी, कौन बाँझ कब लड़का लेकर आयी और कब किस कोढ़ीने कञ्चन-सी काया प्राप्त की ? नोट—बहराइचमें सैयद सालारजंग मसऊद गाजी (गाजीमियाँ) की दरगाह है। वहाँ जेठके महीनेमें हरसाल मेला होता है। वहाँ लोग अन्धविश्वासके कारण तरह-तरहकी कामनाओंको लेकर जाते हैं। कहते हैं कि यह गाजीमियाँ महमूद गजनीका भानजा था। यह गाजी होनेकी इच्छासे अवधकी ओर बढ़ आया था और श्रावस्ती- के राजा सुहृददेवके हाथों मारा गया था ॥४९६॥ ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ । सो गति लखि अत अछत तनु सुख संपति गति पाइ ॥४९७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सुना जाता है, स्वर्गमें जाकर जीव निर्भय हो जाता है (समझता है कि मैं बुढ़ापे और CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri