दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीमारीसे रहित होकर सदा ही भोग भोगता रहूँगा; क्योंकि स्वर्गमें बुढ़ापा और बीमारी नहीं हैं)। परन्तु ऐसी दशा तो यहाँ इस शरीरके रहते भी सुख-सम्पत्ति और ऊँची पदवी पानेपर देखी जाती है (क्योंकि सुख-सम्पत्ति और ऊँचे पदको प्राप्त मनुष्य भी अभिमान- वश अपनेको निर्भय ही मानता है) [परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है।] ॥४६७॥ तुलसी तोरत तीर तरु बक हित हंस बिडारि। बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहु बढ़िआरि ॥४६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गङ्गाजी भी बढ़ जानेपर अपने किनारेके (आश्रित) वृक्षोंको तोड़ डालती हैं, बगुलों (दम्भियों) के लिये हंसोंको (सच्चे ज्ञानियोंको) भगा देती हैं, कमल और भौंरोंसे (सद्गुणोंसे) रहित और मलिन जलवाली (मलिनहृदया) हो जाती हैं। (अर्थात् पार्थिव ऐश्वर्य बढ़ जानेपर सज्जनोंमें भी दोष आ जाते हैं। वे अभिमानमें भरकर पड़ोसी आश्रितोंको मिटा देते हैं, मूर्खतावश सच्चे पुरुषोंको अपने पाससे हटाकर दम्भियोंको आश्रय देते हैं और कुसङ्गतिके कारण सद्गुणोंसे रहित और पापजीवी हो जाते हैं।) ॥४६८॥ अधिकारी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद। सुधा सदन बसु बारहें चउर्थे चउथिउ चंद ॥४६९॥ भावार्थ—बुरा समय आनेपर भले अधिकारियोंको भी बुरा ही समझिये। चन्द्रमा अमृतका भण्डार होनेपर भी आठवें, बारहवें और चौथे स्थानमें पड़नेपर एवं भादों सुदी चौथके दिन देखनेपर हानि- कारक हो जाता है ॥४६६॥