भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१६८ दोहावली नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते हैं त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिँ कुठाट। सूधे टेढ़े सम विषम सब महँ बारहबाट ॥५००॥ भावार्थ—अवसर पड़नेपर मालिक यदि एक प्रकारसे बुराई करता है, तो उसके अनुगामी सेवक तीन प्रकारसे करते हैं। वे सीधे सज्जनोंसे भी टेढ़ा बर्ताव करते हैं, समतामें भी विषमता करते हैं और सब कामोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं ॥५००॥ प्रभुतें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहि सँभारै राउ। कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ ॥५०१॥ भावार्थ—मालिककी अपेक्षा मालिकके परिवारकवर्ग विशेष दुःखदायी होते हैं; इस बातको विचारकर राजाको चाहिये कि वह स्वयं अपनी प्रजाकी सँभाल करे। क्योंकि हाथकी चोटकी अपेक्षा हाथमें पकड़ी हुई तलवार की चोट बहुत ही कठिन और भयङ्कर होती है ॥५०१॥ ब्यालहु तें बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु। वहि के खाएँ मरत है वहि खाए बिनु प्रानु ॥५०२॥ भावार्थ—अपने हृदयमें अहिफेन ( अफीम ) को साँप ( अहि ) से भी अधिक भयङ्कर समझो। साँपके काटनेसे तो आदमी मरता ही है, परन्तु अफीमको खाकर वह [ जीता हुआ भी ] प्राणहीन (मुर्देकी भाँति) हो जाता है ॥५०२॥ कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिँ ओर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥५०३॥ भावार्थ—[श्रीभरतजी महाराज अपनी कठोरताका विवेचन CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri