दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरते हुए कहते हैं कि मैं जो इतना कठोर हूँ, इसमें] मेरा दोष नहीं है; क्योंकि कार्य कारणसे कठोर होता ही है जैसे [दधीचीकी] हड्डीसे बना हुआ वज्र हड्डीसे अधिक कठोर और पत्थरसे उत्पन्न लोहा पत्थरसे भी भयानक और कठोर होता है ॥५०३॥ काल बिलोकत ईस रुख भानु काल अनुहारि । रबिहि राउ राजहि प्रजा बुध व्यवहरहि बिचारि ॥५०४॥ भावार्थ—काल (समय) ईश्वरका रुख देखता है (ईश्वरके इच्छानुसार बदलता रहता है); सूर्य कालका अनुगमन करता है (यथासमय कार्य करता), राजा सूर्यका अनुसरण करता है (सूर्यके यथायोग्य समयपर जल खींचने और बरसानेकी भाँति राजा प्रजासे कररूपमें धन लेकर उसीके हितमें लगा देता है), प्रजा राजा का अनुकरण करती है (जैसा राजा वैसी प्रजा) और बुद्धिमान् पुरुष सब व्यवहार विचारकर करते हैं (वे अपनी बुद्धिका ही अनुसरण करते हैं) ॥५०४॥ जथा अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग । कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीप प्रसंग ॥५०५॥ भावार्थ—जैसे निर्मल और पवित्र वायु बुरी (दुर्गन्धयुक्त) और अच्छी (सुगन्धयुक्त) वस्तुओंके संसर्गसे दुर्गन्धित और सुगन्धित कही जाती है, वैसे ही अच्छे या बुरे राजाके संसर्गसे काल भी अच्छा या बुरा कहा जाता है ॥५०५॥ भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम । सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम ॥५०६॥ भावार्थ—जिस प्रकार [सर्वोत्तम धातु] सोना लोहे [के हथौड़े] से पीट-पीटकर सँवारा जानेपर ही [गहना बनकर]