दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुन्दर स्त्री और सुन्दर राजाको भी भूषित करता है, उसी प्रकार राजाकी [निष्पक्ष] आज्ञा, [स्वार्थरहित] नीति तथा [कड़ाईसे बर्ते जानेवाले न्यायपूर्ण] कानूनके कारण ही भले लोगोंको भी बुरे मार्गमें चलनेमें डर लगता है ॥ ५०६ ॥ राजाको कैसा होना चाहिए ? माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल । प्रजा भाग बस होहिँगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल ॥५०७॥ भावार्थ—माली, सूर्य और किसानके समान नीतिमें निपुण राजा इस कलियुगमें प्रजाके सौभाग्यसे कभी-कभी होंगे [सदा नहीं] । १—माली मुरझाये हुए पौधोंको सींचता है, बढ़े हुए जबरदस्तोंको काट-छांटकर अलग कर देता है, झुके हुए (कमजोर) पौधोंको लकड़ी का टेका देकर गिरनेसे बचा लेता है और फिर फल-फूलोंका संग्रह करता है । २—सूर्य किसीको भी प्रत्यक्षमें दुःख न देकर समुद्र और नदीसे जल खींच लेता है, उसीको अमृत-सा बनाकर यथायोग बरसा देता है । ३—किसान खेत तैयार करता है, खाद देता है, बीज बोता है, सींचता है, रक्षा करता है फिर फसल पकनेपर काटता है ॥ ५०७ ॥ बरषत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ । तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ॥५०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सूर्य जब जलको खींचता