दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १७१ है तब किसीको भी पता नहीं लगता, परंतु जब बरसाता है तब सब लोग प्रसन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार [प्रजाको बिना सताये—यहाँतक कि कर देनेमें प्रजाको कुछ भी कष्ट न हो; इतना-सा कर उगाहकर— समयपर उसी धनसे व्यवस्थितरूपसे प्रजाका हित करनेवाला] सूर्य-सरीखा [कोई] राजा प्रजाके सौभाग्यसे ही होता है ॥५०८॥ राजनीति सुधा सुजान कुजान फल आम असन सम जानि । सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि ॥५०९॥ भावार्थ—सुन्दर दूध, घी आदि अमृत, उत्तम अन्न, कुत्सित अन्न, लताओंके फल, आम आदि पेड़ोंके फल—इन सबको खाद्य रूपमें समान जानकर अच्छे राजा साम, दान आदि नीतियोंके अनुसार प्रजाके हितकी इच्छासे प्रजासे 'कर' के रूपमें ग्रहण कर लेते हैं ॥ ५०९ ॥ पाके पकाए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच । फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच ॥५१०॥ भावार्थ—उत्तम वह है जो वृक्षोंके पके फल लेता है, मध्यम वह है जो [पकनेतककी बाट न देखकर] अधपके फल ही तोड़- कर घरमें पकाता है और नीच वह है जो अधीर होकर पत्तोंको ही नोच डालता है। इसी प्रकार उत्तम राजाको भी मनमें विचारकर तभी कर वसूल करना चाहिये, जब फसल पक जाय, जिससे कि किसान आसानीसे दे सके; जो बिना ही फसल पके कर उगाहता है, वह मध्यम है और अकाल पड़नेपर भी पीड़ा पहुँचाकर किसानसे कर उगाहनेवाला स्वार्थी राजा नीच है ॥ ५१० ॥