दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
दोहावली १७१ है तब किसीको भी पता नहीं लगता, परंतु जब बरसाता है तब सब लोग प्रसन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार [प्रजाको बिना सताये—यहाँतक कि कर देनेमें प्रजाको कुछ भी कष्ट न हो; इतना-सा कर उगाहकर— समयपर उसी धनसे व्यवस्थितरूपसे प्रजाका हित करनेवाला] सूर्य-सरीखा [कोई] राजा प्रजाके सौभाग्यसे ही होता है ॥५०८॥ राजनीति सुधा सुजान कुजान फल आम असन सम जानि । सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि ॥५०९॥ भावार्थ—सुन्दर दूध, घी आदि अमृत, उत्तम अन्न, कुत्सित अन्न, लताओंके फल, आम आदि पेड़ोंके फल—इन सबको खाद्य रूपमें समान जानकर अच्छे राजा साम, दान आदि नीतियोंके अनुसार प्रजाके हितकी इच्छासे प्रजासे 'कर' के रूपमें ग्रहण कर लेते हैं ॥ ५०९ ॥ पाके पकाए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच । फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच ॥५१०॥ भावार्थ—उत्तम वह है जो वृक्षोंके पके फल लेता है, मध्यम वह है जो [पकनेतककी बाट न देखकर] अधपके फल ही तोड़- कर घरमें पकाता है और नीच वह है जो अधीर होकर पत्तोंको ही नोच डालता है। इसी प्रकार उत्तम राजाको भी मनमें विचारकर तभी कर वसूल करना चाहिये, जब फसल पक जाय, जिससे कि किसान आसानीसे दे सके; जो बिना ही फसल पके कर उगाहता है, वह मध्यम है और अकाल पड़नेपर भी पीड़ा पहुँचाकर किसानसे कर उगाहनेवाला स्वार्थी राजा नीच है ॥ ५१० ॥
१७२ दोहावली रीझि खीझि गुरु देत सिख सखा सुसाहिब साधु । तोरि खाइ फल होइ भल तरु काटें अपराधु ॥५७१॥ भावार्थ—गुरु, मित्र, अच्छे मालिक और साधुजन प्रसन्न होकर या [न माननेपर हमारे हितके लिये] क्रुद्ध होकर यही उपदेश देते हैं कि पका फल ही पेड़से तोड़कर खाना अच्छा है, पेड़को काट डालना अपराध है [राजाको कर उगाहनेके समय यह उपदेश ध्यानमें रखना चाहिये] ॥५७१॥ धरनि धेनु चारितु चरत प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ । हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ की गाइ ॥५७२॥ भावार्थ—पृथ्वीरुपी गौ जब राजाके प्रजावत्सलता तथा धर्म- युक्त उत्तम चरित्ररूपी चारेको चरकर दुग्धवती होती है और जब प्रजारूपी सुन्दर बछड़ेके द्वारा चोंखे जानेपर पेन्हाती है [तभी उत्तम और अधिक दूध मिलता है], सिर्फ पैर बाँधकर दुहनेसे कुछ भी दूध हाथ नहीं लगता ॥५७२॥ चढ़े बबूरैं चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज । करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज ॥५७३॥ भावार्थ—जो दशा बवंडरमें पड़ी हुई पतंगकी और शोकोंके समूहमें पड़े हुए विवेककी होती है (अर्थात् वे नष्ट हो जाते हैं) वही दशा बुरे राज्यमें [सत्] कर्म, [सनातन] धर्म और सुख- सम्पत्तिकी भी समझनी चाहिये ॥५७३॥ कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरि । मरहिं कुनृप करि करि कुनय सों कुचालि भव भूरि ॥५७४॥ भावार्थ—जैसे खजूरकी हजारों शाखाएँ वृक्षमें बहुतेरे
दोहावली १७३ काँटे बना-बनाकर (स्वयं टूट-टूटकर) गिर पड़ती हैं, इसी प्रकार दुष्ट राजा भी अपनी दुष्ट नीतिसे कुचाल कर-करके संसारमें बार-बार जन्मते-मरते हैं ॥५१४॥ काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल । पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमी पाल ॥५१५॥ भावार्थ—काल (समय) ही गोलंदाज है, पृथ्वी ही तोप है, विकराल अनीति ही बारूद है, पाप ही पलीता है और राजा ही कठोर तथा भारी गोला है (अर्थात् बुरा समय ही दुष्ट राजाके द्वारा प्रजाका नाश कराता है) ॥५१५॥ किसका राज्य अचल हो जाता है ? भूमि रुचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल । धरम राम नय सीय बल अचल होत सुभ काल ॥५१६॥ भावार्थ—पृथ्वी ही रावणकी सुन्दर सभा है, इसमें राजा ही अङ्गदका पैर है, धर्मरूपी राम और नीतिरूपी सीताके बदले ही वह राजारूपी अङ्गदका पैर शुभ समयमें अचल हो जाता है ॥५१६॥ प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ । प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँ ॥५१७॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें जिसकी प्रीति है, [प्रजाहितकी] नीतिमें जो सदा रत है और धर्ममें जिसका स्वाभाविक ही विश्वास है, उस राजाको प्रभुता मन, वचन और शरीरसे कभी नहीं छोड़ती (अर्थात् उसका राज्य सदा बना रहता है) ॥५१७॥ कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि । भूपहि भूलि न परिहरैं बिजय बिभूति सयानि ॥५१८॥
१७४ दोहावली भावार्थ—जिस राजाके हाथमें हाथके गुण (रक्षा करना, दान देना आदि) हों, मनमें मनके गुण (प्रजावत्सलता, उदारता आदि) हों और वचनमें वचनके गुण (मधुरता, सत्यता, हितवादिता आदि) हों उस राजाको विजय, ऐश्वर्य और बुद्धिमत्ता भूलकर भी नहीं छोड़ते ॥५१८॥ गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु । उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु ॥५१९॥ भावार्थ—गोली, साधारण बाण और सुमन्त्रित बाण [के गुणों] को मनमें समझकर और फिंर इनके क्रमको उलटकर देखो और विचार करो कि उत्तम, मध्यम और नीच राजाके वचन क्रमशः ऐसे ही होते हैं, (अर्थात् उत्तम राजाके वचन सुमन्त्रित बाणके समान अमोघ हैं, जो कभी व्यर्थ नहीं जाते; मध्यम राजाके वचन साधारण बाणके समान हैं जो व्यर्थ भी जा सकते हैं और नीच राजाके वचन गोलीके समान होते हैं—उनका शब्द तो बहुत विकराल होता है, परंतु निशाना चूक गया तो काम कुछ भी नहीं होता) ॥५१९॥ सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव । बूढ़त लखि पग डगत लखि चपरि चहूँ दिसि धाव॥५२०॥ भावार्थ—चतुर शत्रु पानीके समान शत्रुरूपी नावको सिरपर रखता है (शत्रुका ऊपरसे बड़ा सत्कार करता है), परंतु उसको डूबते हुए देखकर या पैर डगमगाते हुए देखकर तुरंत ही चारों ओरसे उसपर धावा कर देता है ॥५२०॥ रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु । सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥५२१॥
दोहावली १७५ भावार्थ—प्रजा, राजसमाज, घर, अपना शरीर, धन, धर्म और सेना आदिको शान्त और सुयोग्य मन्त्रियोंके हाथोंमें सौंप- कर ही राजा नित्य सुखसे रह सकता है (अर्थात् जहाँ मन्त्री शान्त और योग्य नहीं होते; वहाँ राजा सुखसे नहीं रह सकता) ॥५२१॥ मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक । पालइ पोषइ सकल अँग तुलसि सहित बिबेक ॥५२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रधान (राजा) को मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेके लिये तो एक ही है; परंतु विवेकके साथ समस्त अङ्गोंका पालन-पोषण करता है ॥५२२॥ सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ । तुलसी प्रीति की रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥५२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान होने चाहिये और मालिक मुखके समान होना चाहिये । सेवक-स्वामीकी प्रीतिकी रीतिको सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं। (अर्थात् जैसे हाथ, पैर, आंख आदि खाद्य सामग्रियोंके संग्रहमें और विपत्ति पड़ने पर रक्षा करनेमें सहायता करते हैं, उसी प्रकार सेवककी मालिकको सहायता करनी चाहिये । और जैसे मुख सब पदार्थोंको खाता है, परंतु खाकर सब अङ्गोंको यथायोग्य रस पहुँचाता है और उन्हें पुष्ट करता है उसी प्रकार मालिकको सबका पेट भरकर उन्हें शक्तिमान् बनाना चाहिये ॥५२३॥
१७६ दोहावली सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥५२४॥ भावार्थ—यदि मन्त्री, वैद्य और गुरु [अप्रसन्नताके] भयसे या [स्वार्थसाधनकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] 'हाँ' में 'हाँ' मिलाने लगते हैं तो राज्य, धर्म और शरीर—इन तीनोंका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥५२४॥ रसना मंत्री दसन जन तोष पोष निज काज। उदर प्रभु कर पद सेन पदातिक बालक राज समाज ॥५२५॥ भावार्थ—राजा पेट है, मन्त्री जीभ है और अन्य कर्मचारी दांत हैं। जैसे दाँत भोजनको कुचलकर और जीभ उसका स्वाद लेकर तथा अपनी लार साथ लेकर उसे पेटमें पहुँचा देती हैं और पेट रस बनाकर सारे अङ्गोंको पुष्ट और संतुष्ट करता है, उसी प्रकार मन्त्री और अन्य राजकर्मचारी राजाके लिये सब अपना-अपना काम ठीक करते हैं और बदलेमें राजा उन सबका पोषण करता है और उन्हें संतुष्ट करता है। सेना और पदातिजन राजाके हाथ और पैर हैं। जैसे हाथ-पैर पेटकी रक्षा करते हैं और पेट हाथ-पैरको पालता-पोषता है, उसी प्रकार सेना-पदाति राजाकी रक्षा करते हैं और राजा उनका पालन- पोषण करता है। फिर राजा माता-पिताके समान है और सारा राज- समाज राजाका बालक है। जैसे माता-पिता बालकका पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही राजा सारे राजसमाजको पालता-पोषता है ॥५२५॥ लकड़ी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि। सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि ॥५२६॥
दोहावली १७७ भावार्थ—जिस तरह कामकी सरसताके अनुसार लकड़ीके चम्मच या धातुकी करछुलका यथायोग्य संग्रह और त्याग किया जाता है (कहीं लकड़ीके चम्मचसे काम लिया जाता है तो कहीं उसका त्याग करके धातुकी करछुलीकी ही जरूरत पड़ती है) उसी प्रकार अच्छे स्वामी भी विचार करके सब प्रकारके सेवकों तथा सखाओंका यथायोग्य संग्रह और त्याग करते हैं ॥५२६॥ प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान । तुलसी प्रकट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान ॥५२७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मालिकके निकट छोटे, बड़े, निर्बल और बलवान्—सभी प्रकारके लोग रहते हैं। हाथकी अँगुलियोंसे अनुमान करके इस बातको प्रत्यक्ष देख लेना चाहिये (पाँचों अँगुलियाँ एक ही हाथमें हैं, परंतु बराबरकी नहीं हैं) ॥५२७॥ आज्ञाकारी सेवक स्वामीसे बड़ा होता है साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान । राम बाँधि उतरे उदधि लाँघि गए हनुमान ॥५२८॥ भावार्थ—वह सेवक स्वामीसे बड़ा है, जो अपने धर्मपालनमें निपुण है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तो पुल बाँधकर समुद्रके पार उतरे, परंतु हनुमान्जी उसी समुद्रको लाँघकर चले गये ॥५२८॥ मूलके अनुसार बढ़नेवाला और बिना अभिमान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है तुलसी भल बरतरु बढ़त निज मूलहि अनुकूल । सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल ॥५२९॥
१७८ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते है कि बड़का वृक्ष उत्तम है, जो अपनी जड़ ( बुनियाद ) के अनुसार ही बढ़ता है और बिना ही फूले (घमंड किये बिना ही) अपने पत्तों और फलोंद्वारा सबको सब प्रकारसे सुख देता है ॥५२६॥ त्रिभुवनके दीप कौन हैं ? सधन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप । तुलसी जे अभिमान बिनु ते त्रिभुवन के दीप ॥५३०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो पुरुष धनवान्, गुणवान्, धर्मात्मा सेवकोंसे युक्त, बलवान् और सुयोग्य स्वामी तथा राजा होते हुए भी अभिमानरहित होते हैं, वे ही तीनों लोकोंके उजागर होते हैं ॥५३०॥ कीर्ति करतूतिसे ही होती है । तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ । गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ ॥५३१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि कोई जीव अपने पुरुषार्थके बिना ही मुक्त हो जाता है [ तो उसकी कीर्ति नहीं होती] अजामिल श्रीहरिके लोकको चला गया, परन्तु वह अपनी बदनामीको नहीं धो सका (अब भी उसकी उपमा लोग पापियोंसे ही देते हैं) ॥५३१॥ बड़ोंका आश्रय भी मनुष्यको बड़ा बना देता है बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड । श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मांड ॥५३२॥
दोहावली १७९ भावार्थ—बड़ेके अपनानेसे भी मनुष्य बड़ा हो जाता है, जैसे वामन भगवान्के हाथका दण्ड उनके साथ ही बढ़कर अखिल ब्रह्माण्डतक पहुँच गया ॥५३२॥
कपटी दानीकी दुर्गति
तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाइ । प्रतिग्राही जीवै नहीं दाता नरकै जाइ ॥५३३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जो लोग हाथ उठाकर [मछलियोंको फाँसनेके लिये] जलमें दान देते हैं (चारा डालते हैं), उस दानको ग्रहण करनेवाली मछली तो जीती नहीं और वह दाता भी नरकमें जाता है ॥५३३॥
अपने लोगों के छोड़ देनेपर सभी वैरी हो जाते हैं
आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ । तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ ॥५३४॥* भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिस दिन अपने ही लोग अपना साथ छोड़ देते हैं, उस दिन कोई भी हित करनेवाला नहीं रह जाता [सूर्य कमलका मित्र है, परन्तु] जब जल कमलका साथ छोड़ देता है, तब वही सूर्य कमलका वैरी बनकर उसे जला डालता है ॥५३४॥
- श्रीरामचरितमानसमें भी इसी भावकी एक अर्द्धाली मिलती है— भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ तेहि छारा ।
१८० दोहावली साधनसे मनुष्य ऊपर उठता है और साधन बिना गिर जाता है उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान । तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान ॥५३५॥ भावार्थ—मोरकी पाँख जब जमीनकी ओर नीचे पड़ी रहती है, तो वह कलाहीन हो जाती है और वही जब ऊपरको होती है तो कलाप्रधान हो जाती है (जगमगा उठती है) । तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरकी पाँखकी गति देखो और समझो कि मेघ ही इसमें प्रधान साधन है (तात्पर्य यह कि मोरपंखकी गतिको समझकर तुम भी प्रेमघन घनश्याम श्रीरामजीके प्रेमको पहचानकर नाच उठो) ॥५३५॥ सज्जनको दुष्टोंका संग भी मंगलदायक होता है तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म-दानि । ज्यों हरि रूप सुताहि तें कीन्हि गोहारी आनि ॥५३६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनके लिये नीचकी सङ्गति भी मङ्गलदायिनी होती है। जैसे विष्णुरूप बने हुए बढ़ईसे विवाह करनेवाली राजकन्याकी पुकार सुनकर साक्षात् भगवान् विष्णुने आकर सहायता की । [एक राजकन्याने भगवान् विष्णुके साथ विवाह करनेकी प्रतिज्ञा की थी। एक चालाक बढ़ईने काठके दो हाथ जोड़कर विष्णुका रूप बनाया और उस राजकन्यासे विवाह कर लिया । एक बार राजकन्याके पितापर कुछ विपत्ति आयी, तब पिताके कहनेसे कन्याने भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की और कहा कि मैं
दोहावली १८१ तो आपको ही बरना चाहती थी, बढ़ईने तो धोकेसे मुझको विवाह लिया; अतएव इस समय आप ही मेरे पिताकी रक्षा कीजिये। भगवान् विष्णुने कन्याकी सरल और सत्य प्रार्थनाको स्वीकार करके उसके पिताको विपत्तिसे मुक्त किया।] ॥५३६॥ कलियुगमें कुटिलताकी वृद्धि कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र। तुलसी यह निहचय भई बाढ़ि लेति नव बक्र ॥५३७॥ भावार्थ—कलियुगकी कुचाल शुभ बुद्धिको हरनेवाली है, इसीलिये राजचक्र भी सरलस्वभावके साधुओंको ही दण्ड देता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह निश्चय हो गया कि कलियुगमें कुटिलता नित नयी-नयी बढ़ रही है ॥५३७॥ आपसमें मेल रखना उत्तम है गो खग खे खग बारि खग तीनों माहिं बिसेक। तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरैं सँग एक ॥५३८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि पृथ्वी, आकाश और जलमें रहनेवाले तीनों प्रकारके पक्षियोंमें यह विशेषता है कि वे सब अपने- अपने दल बनाकर एक ही साथ पानी पीते हैं, चलते-फिरते हैं और रहते हैं (मनुष्योंको इनसे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये) ॥५३८॥ सब समय समतामें स्थित रहनेवाले पुरुष ही श्रेष्ठ हैं साधन समय सुसिद्धि लहि उभय फूल अनुकूल। तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल ॥५३९॥
१८२ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि वे ही लोग इस पृथ्वीपर मङ्गल-मूल होते हैं, जो [मनोरथ सिद्धिके] अनुकूल साधन और अनुकूल समय तथा इन दोनोंके मूल उद्देश्यरूप सुन्दर सिद्धिको प्राप्त करके भी तीनों कालमें एकरस—समता-युक्त रहते हैं ॥५३९॥ जीवन किनका सफल है ? मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभाय। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जाय ॥५४०॥ भावार्थ—जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वभावसे ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने जन्म लेनेका लाभ पाया है, नहीं तो जगत्में जन्म लेना व्यर्थ ही है ॥५४०॥ पिताकी आज्ञाका पालन सुखका मूल है अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥५४१॥ भावार्थ—जो पुरुष अनुचित-उचितका विचार छोड़कर (श्रद्धापूर्वक) पिताके वचनोंका पालन करते हैं वे [यहाँ] सुख और सुकीर्तिके पात्र होकर [शरीर छोड़नेके पश्चात्] इन्द्रपुरीमें निवास करते हैं ॥५४१॥ स्त्रीके लिए पतिसेवा ही कल्याणदायिनी है सोरठा सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ । जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥५४२॥
दोहावली १८३ भावार्थ—स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किंतु पतिसेवा करनेसे वह [अनायास ही] शुभ गतिको प्राप्त होती है। पतिव्रता स्त्री वृन्दाका यश चारों वेद गाते हैं और आज भी वह तुलसीके रूपमें श्रीहरिकी प्रिया बनी हुई है ॥५४२॥ शरणागतका त्याग पापका मूल है दोहा सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि । ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥५४३॥ भावार्थ—जो शरणागतकी रक्षा करनेमें अपना अहित सोचकर उसका त्याग कर देते हैं, वे मनुष्य पामर (क्षुद्र) और पापमय हैं और उनका मुख देखनेसे भी हानि होती है ॥५४३॥ तुलसी तृन जलकूलको निरबल निपट निकाज । कै राखै कै सँग चलै बाँह गहे की लाज ॥५४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नदीतटका तृण अत्यन्त ही निर्बल और निकम्मा होता है, परंतु [कोई डूबनेवाला आदमी उसे पकड़ लेता है तो] वह भी अपनी बाँह पकड़नेकी लाजके कारण या तो उस शरणागतको बचा लेता है; अथवा [उसके बचानेकी चेष्टामें] स्वयं ही उखड़कर उसके साथ बह जाता है ॥५४४॥ कलियुगका वर्णन रामायन अनुहरत सिख जग भयो भारत रीति । तुलसी सठ की को सुनै कलि कुचालि पर प्रीति ॥५४५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलिकालमें लोगोंकी प्रीति
१८४ दोहावली कुचालपर ही रहती है; मुझ-जैसे मूर्खकी कौन सुनता है। लोगोंको सीख तो यह दी जाती है कि रामायणके अनुसार चलो (अर्थात् स्वार्थत्यागपूर्वक भाई-भाईमें प्रेम रक्खो), परन्तु संसारमें लोग अनु- करण करते हैं महाभारतका (अर्थात् स्वार्थवश परस्पर कलहमें ही लगे रहते हैं) ॥५४५॥ पात पात कै सींचिबो बरी बरी कै लोन । तुलसी खोटें चतुरपन कलि डहके कहु को न ॥५४६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुगमें लोग पेड़के एक-एक पत्तेको अलग-अलग सींचना और एक-एक बरामें अलग अलग नमक मिलाना चाहते हैं (जिससे न तो पेड़की जड़में जल पहुँचता है और न सब वरियोंमें समान नमक पड़ता है) ऐसी हालतमें कहिये अपनी इस खोटी चतुराईसे कलियुगमें कौन नहीं ठगे गये (अपनी ही करनीसे आप ही दुःख पाते हैं) ॥५४६॥ प्रीति सगाई सकल बिधि बनिज उपायँ अनेक । कल बल छल कलि मल मलिन डहकत एकहि एक ॥५४७॥ भावार्थ—कलियुगके पापोंसे मलिन-मन हुए लोग प्रीति करके नाता जोड़कर वाणिज्य आदि अनेक उपायोंसे सब प्रकार कल-बल- छल करके परस्पर एक-दूसरेको ठगा करते हैं ॥५४७॥ दंभ सहित कलि धरम सब छल समेत व्यवहार । स्वारथ सहित सनेह सब रुचि अनुहरत अचार ॥५४८॥ भावार्थ—कलिके धर्म सब दम्भयुक्त हैं, व्यवहार कपटयुक्त हैं, प्रेम स्वार्थयुक्त हैं और आचरण मनमाना है (अर्थात् सच्चा धर्म, निष्कपट व्यवहार, निःस्वार्थ प्रेम और शास्त्रोक्त आचरण नहीं है) ॥५४८॥
दोहावली १८५ चोर चतुर बटमार नट प्रभु प्रिय भँडुआ भांड। सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड ॥५४९॥ भावार्थ—कलियुगमें चोर ही चतुर माने जाते हैं (अर्थात् जो सफाईसे दूसरोंका स्वत्व हरण कर लेते हैं, उन्हींको लोग चतुर कहते हैं); लुटेरे ही खिलाड़ी (कलावन्त) गिने जाते हैं (जो मार- पीटकर धन छीन लेते हैं, उनको खिलाड़ी कहा जाता है); भांड और भडुए ही राजाओं या मालिकोंको प्रिय होते हैं (जो खुशामद करके या तरह-तरहकी भाव-भंगियोंसे मूर्ख मालिकोंको रिझाते रहते हैं, वे ही उन्हें प्रिय होते हैं; सत्यवादी सदाचारी नहीं); खान पानका विचार त्यागकर सब कुछ खानेवाले ही महात्मा माने जाते हैं और पाखण्ड ही सन्मार्ग समझा जाता है अर्थात् सभी विपरीत हो रहा है ॥५४९॥ असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग मांहि ॥५५०॥ भावार्थ—जो लोग अशुभ वेष बनाये रहते हैं—अशुभ अलंकार धारण करते हैं तथा खानेयोग्य और न खानेयोग्य सब कुछ खा जाते हैं—इस कलियुगमें वे ही मनुष्य योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही पूज्य हैं ॥५५०॥ सोरठा जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ ॥५५१॥ भावार्थ—जो अपने आचरणसे दूसरोंका बुरा करनेवाले हैं, कलियुगमें उन्हींका गौरव है और वे ही मानके योग्य हैं एवं जो मन, बचन तथा कर्मसे झूठे होते हैं, वे ही वक्ता माने जाते हैं ॥५५१॥
१८६ दोहावली दोहा ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात । कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥१५२॥ भावार्थ—इस कलियुगमें स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानको छोड़कर दूसरी चर्चा ही नहीं करते, किंतु वे ही [मिथ्या ब्रह्मज्ञानी] लोभवश एक कौड़ीके लिये ब्राह्मण और गुरुजनोंका घात कर डालते हैं [और कहते हैं कि कौन मरता है, कौन मारता है] ॥१५२॥ बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि । जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥१५३॥ भावार्थ—कलियुगमें शूद्रलोग ब्राह्मणोंसे वाद-विवाद करते हैं, और आँख दिखाकर डांटते हुए कहते हैं कि 'क्या हम तुमसे कुछ कम हैं जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं' ॥१५३॥ साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान । भगति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान ॥१५४॥ भाव
दोहावली १८७ सकल धरम बिपरीत कलि कलपित कोटि कुपंथ । पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥५५६॥ भावार्थ—कलियुगमें सभी कुछ धर्मके प्रतिकूल हो गया, नये- नये करोड़ों कुमार्ग कल्पित हो गये (वास्तवमें वे मार्ग नहीं हैं मनमानी कल्पनामात्र हैं)। इससे पुण्य तो पहाड़ोंमें भाग गया और पुराणादि सद्ग्रन्थ वनोंमें जाकर छिप गये (अर्थात वनोंमें और पर्वतोंकी गुहाओंमें एकान्तवास करनेवाले कुछ महात्माओंमें ही पुण्य और सद्ग्रन्थोंका पठन-पाठन रह गया है) ॥५५६॥ धातुबाद निरुपाधि बर सदगुरु लाभ सुमीत । देव दरस कलिकाल में पोथिन दुरे सभीत ॥५५७॥ भावार्थ—कलियुगमें रसायनविद्या, उपाधिरहित (अबाधित) वरदान, सद्गुरुकी प्राप्ति, सच्चे मित्र और देवताके प्रत्यक्ष दर्शन—ये पाँचों बातें डरके मारे पुस्तकोंमें छिप गयी हैं (अर्थात् पुस्तकोंहीमें इनके वर्णन मिलते हैं, प्रत्यक्षमें ये दिखलायी नहीं देते) ॥५५७॥ सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज । मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज ॥५५८॥ भावार्थ—देवालय (मन्दिर), तीर्थ और पवित्र पुरियोंमें सर्वत्र ही अत्यन्त भ्रष्टाचार और भ्रष्ट वातावरण फैल गया है। मानो उन स्थानोंमें कलियुग अपने सारे समाजके (काम, क्रोध दम्भ, लोभ, कपट, दुराग्रह, असत्य, हिंसा, स्तेय, व्यभिचार आदि दोषों एवं दुर्गुणोंके) साथ किलेबंदी करके विराजमान रहता है ॥५५८॥ गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल । साम न दाम न भेद कलि केवल दंड कराल ॥५५९॥
१८८ दोहावली भावार्थ—कलियुगमें गोंड़ ( जंगली लोग ) और गँवार तो पृथ्वीके राजा हो रहे हैं और यवन-म्लेच्छादि वादशाह । इनकी राजनीतिमें साम, दान, भेदका प्रयोग न होकर केवल कठोर दण्डका ही प्रयोग होता है ॥५५९॥ फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अठुक पहार । कायर कूर कुपूत कलि घर घर सहस डहार ॥५६०॥ भावार्थ—जैसे पहाड़ की ठोकर लगनेपर [उसपर कुछ भी वश न चलनेसे] मूर्ख लोग [पहाड़के बदले] घरके सिल-लोढ़ेको फोड़ डालते हैं । इस प्रकार अपने ही घरवालोंको तंग करनेवाले कायर, क्रूर और कुपूत कलियुगमें सहस्रोंकी संख्यामें घर-घर होंगे ॥५६०॥ प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान । जेन केन बिधि दीन्हें दान करन कल्यान ॥५६१॥ भावार्थ—सत्य, अहिंसा, शौच और दान—धर्मके ये चार चरण प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलियुगमें एक (दान) ही प्रधान रह गया है, जिस किसी भी प्रकारसे दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ॥५६१॥ कलिजुग सम जुग आन नहिं जौ नर कर बिश्वास । गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥५६२॥ भावार्थ—यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुगके समान और कोई भी युग नहीं है; क्योंकि इसमें केवल श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणसमूहोंका गान करके ही मनुष्य बिना ही किसी परिश्रमके भवसागरसे तर जाता है ॥५६२॥
दोहावली १८३ और चाहे जो भी घट जाय, भगवान्में प्रेम नहीं घटना चाहिये श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह । इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह ॥५६३॥ भावार्थ—कानोंसे चाहे कम सुनायी पड़े, आँखोंकी रोशनी भी चाहे घट जाय, सारे शरीरका बल भी चाहे क्षीण हो जाय; किन्तु यदि श्रीहरिमें प्रेम नहीं घटे तो इनके घटनेसे हमारा क्या घट जायगा ? ॥५६३॥ कुसमयका प्रभाव तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन । अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहैं कौन ॥५६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बरसातकी मौसममें कोयल यह समझकर मौन हो जाती है कि अब तो मेढक टर्रायेंगे, हमें कौन पूछेगा ? (बुरा समय आनेपर दुर्जनोंकी ही चलती है, उस समय सज्जन चुप हो रहते हैं) ॥५६४॥ श्रीरामजीके गुणों की महिमा कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाखंड । दहन राम गुन ग्राम जिमि ईंधन अनल प्रचंड ॥५६५॥ भावार्थ—कलियुगके कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल, कपट, दम्भ और पाखण्डको जलानेके लिए श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमुदाय वैसे ही हैं, जैसे ईंधनको जलानेके लिये प्रचण्ड अग्नि ॥५६५॥
१६० दोहावली कलियुगमें दो ही आधार हैं सोरठा कलि पाखंड प्रचार प्रबल पाप पामँर पतित । तुलसी उभय अधार राम नाम सुरसरि सलिल ॥५६६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुगमें केवल पाखण्डका प्रचार है; संसारमें पाप बहुत प्रबल हो गया है, सब ओर पामर और पतित ही नजर आते हैं। ऐसी स्थितिमें दो ही आधार हैं—एक श्रीरामनाम और दूसरा देवनदी श्रीगङ्गाजीका पवित्र जल ॥५६६॥ भगवत्प्रेम ही सब मंगलोंकी खान है दोहा रामचंद्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होइ । राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोइ ॥५६७॥ भावार्थ—जिस समय भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको निरखने के लिये चित्त चकोर बन जाता है, वही समय रामराज्यकी भांति सुहावना होता है और तभी सब काम शुभ होते हैं ॥५६७॥ बीज राम गुन गन नयन जल अंकुर पुलकालि । सुकृती सुतन सुखेत बर बिलसत तुलसी सालि ॥५६८॥ भावार्थ—जब परम पुण्यात्मा पुरुषके [ पापरहित ] निर्मल तनुरूपी सुन्दर और श्रेष्ठ खेतमें श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहरूपी बीज बोये जायँ और प्रेमाश्रुओंके [ पवित्र ] जलसे उन्हें सींचा जाय, तुलसीदासजी कहते हैं कि तब उनमेंसे [ आनन्दातिरेकके