दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० दोहावली साधनसे मनुष्य ऊपर उठता है और साधन बिना गिर जाता है उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान । तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान ॥५३५॥ भावार्थ—मोरकी पाँख जब जमीनकी ओर नीचे पड़ी रहती है, तो वह कलाहीन हो जाती है और वही जब ऊपरको होती है तो कलाप्रधान हो जाती है (जगमगा उठती है) । तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरकी पाँखकी गति देखो और समझो कि मेघ ही इसमें प्रधान साधन है (तात्पर्य यह कि मोरपंखकी गतिको समझकर तुम भी प्रेमघन घनश्याम श्रीरामजीके प्रेमको पहचानकर नाच उठो) ॥५३५॥ सज्जनको दुष्टोंका संग भी मंगलदायक होता है तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म-दानि । ज्यों हरि रूप सुताहि तें कीन्हि गोहारी आनि ॥५३६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनके लिये नीचकी सङ्गति भी मङ्गलदायिनी होती है। जैसे विष्णुरूप बने हुए बढ़ईसे विवाह करनेवाली राजकन्याकी पुकार सुनकर साक्षात् भगवान् विष्णुने आकर सहायता की । [एक राजकन्याने भगवान् विष्णुके साथ विवाह करनेकी प्रतिज्ञा की थी। एक चालाक बढ़ईने काठके दो हाथ जोड़कर विष्णुका रूप बनाया और उस राजकन्यासे विवाह कर लिया । एक बार राजकन्याके पितापर कुछ विपत्ति आयी, तब पिताके कहनेसे कन्याने भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की और कहा कि मैं