भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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दोहावली १८१ तो आपको ही बरना चाहती थी, बढ़ईने तो धोकेसे मुझको विवाह लिया; अतएव इस समय आप ही मेरे पिताकी रक्षा कीजिये। भगवान् विष्णुने कन्याकी सरल और सत्य प्रार्थनाको स्वीकार करके उसके पिताको विपत्तिसे मुक्त किया।] ॥५३६॥ कलियुगमें कुटिलताकी वृद्धि कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र। तुलसी यह निहचय भई बाढ़ि लेति नव बक्र ॥५३७॥ भावार्थ—कलियुगकी कुचाल शुभ बुद्धिको हरनेवाली है, इसीलिये राजचक्र भी सरलस्वभावके साधुओंको ही दण्ड देता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह निश्चय हो गया कि कलियुगमें कुटिलता नित नयी-नयी बढ़ रही है ॥५३७॥ आपसमें मेल रखना उत्तम है गो खग खे खग बारि खग तीनों माहिं बिसेक। तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरैं सँग एक ॥५३८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि पृथ्वी, आकाश और जलमें रहनेवाले तीनों प्रकारके पक्षियोंमें यह विशेषता है कि वे सब अपने- अपने दल बनाकर एक ही साथ पानी पीते हैं, चलते-फिरते हैं और रहते हैं (मनुष्योंको इनसे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये) ॥५३८॥ सब समय समतामें स्थित रहनेवाले पुरुष ही श्रेष्ठ हैं साधन समय सुसिद्धि लहि उभय फूल अनुकूल। तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल ॥५३९॥