दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि वे ही लोग इस पृथ्वीपर मङ्गल-मूल होते हैं, जो [मनोरथ सिद्धिके] अनुकूल साधन और अनुकूल समय तथा इन दोनोंके मूल उद्देश्यरूप सुन्दर सिद्धिको प्राप्त करके भी तीनों कालमें एकरस—समता-युक्त रहते हैं ॥५३९॥ जीवन किनका सफल है ? मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभाय। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जाय ॥५४०॥ भावार्थ—जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वभावसे ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने जन्म लेनेका लाभ पाया है, नहीं तो जगत्में जन्म लेना व्यर्थ ही है ॥५४०॥ पिताकी आज्ञाका पालन सुखका मूल है अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥५४१॥ भावार्थ—जो पुरुष अनुचित-उचितका विचार छोड़कर (श्रद्धापूर्वक) पिताके वचनोंका पालन करते हैं वे [यहाँ] सुख और सुकीर्तिके पात्र होकर [शरीर छोड़नेके पश्चात्] इन्द्रपुरीमें निवास करते हैं ॥५४१॥ स्त्रीके लिए पतिसेवा ही कल्याणदायिनी है सोरठा सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ । जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥५४२॥