दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १८३ भावार्थ—स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किंतु पतिसेवा करनेसे वह [अनायास ही] शुभ गतिको प्राप्त होती है। पतिव्रता स्त्री वृन्दाका यश चारों वेद गाते हैं और आज भी वह तुलसीके रूपमें श्रीहरिकी प्रिया बनी हुई है ॥५४२॥ शरणागतका त्याग पापका मूल है दोहा सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि । ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥५४३॥ भावार्थ—जो शरणागतकी रक्षा करनेमें अपना अहित सोचकर उसका त्याग कर देते हैं, वे मनुष्य पामर (क्षुद्र) और पापमय हैं और उनका मुख देखनेसे भी हानि होती है ॥५४३॥ तुलसी तृन जलकूलको निरबल निपट निकाज । कै राखै कै सँग चलै बाँह गहे की लाज ॥५४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नदीतटका तृण अत्यन्त ही निर्बल और निकम्मा होता है, परंतु [कोई डूबनेवाला आदमी उसे पकड़ लेता है तो] वह भी अपनी बाँह पकड़नेकी लाजके कारण या तो उस शरणागतको बचा लेता है; अथवा [उसके बचानेकी चेष्टामें] स्वयं ही उखड़कर उसके साथ बह जाता है ॥५४४॥ कलियुगका वर्णन रामायन अनुहरत सिख जग भयो भारत रीति । तुलसी सठ की को सुनै कलि कुचालि पर प्रीति ॥५४५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कलिकालमें लोगोंकी प्रीति