दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १७९ भावार्थ—बड़ेके अपनानेसे भी मनुष्य बड़ा हो जाता है, जैसे वामन भगवान्के हाथका दण्ड उनके साथ ही बढ़कर अखिल ब्रह्माण्डतक पहुँच गया ॥५३२॥
कपटी दानीकी दुर्गति
तुलसी दान जो देत हैं जल में हाथ उठाइ । प्रतिग्राही जीवै नहीं दाता नरकै जाइ ॥५३३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जो लोग हाथ उठाकर [मछलियोंको फाँसनेके लिये] जलमें दान देते हैं (चारा डालते हैं), उस दानको ग्रहण करनेवाली मछली तो जीती नहीं और वह दाता भी नरकमें जाता है ॥५३३॥
अपने लोगों के छोड़ देनेपर सभी वैरी हो जाते हैं
आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ । तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ ॥५३४॥* भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिस दिन अपने ही लोग अपना साथ छोड़ देते हैं, उस दिन कोई भी हित करनेवाला नहीं रह जाता [सूर्य कमलका मित्र है, परन्तु] जब जल कमलका साथ छोड़ देता है, तब वही सूर्य कमलका वैरी बनकर उसे जला डालता है ॥५३४॥
- श्रीरामचरितमानसमें भी इसी भावकी एक अर्द्धाली मिलती है— भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ तेहि छारा ।