भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१७८ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते है कि बड़का वृक्ष उत्तम है, जो अपनी जड़ ( बुनियाद ) के अनुसार ही बढ़ता है और बिना ही फूले (घमंड किये बिना ही) अपने पत्तों और फलोंद्वारा सबको सब प्रकारसे सुख देता है ॥५२६॥ त्रिभुवनके दीप कौन हैं ? सधन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप । तुलसी जे अभिमान बिनु ते त्रिभुवन के दीप ॥५३०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो पुरुष धनवान्, गुणवान्, धर्मात्मा सेवकोंसे युक्त, बलवान् और सुयोग्य स्वामी तथा राजा होते हुए भी अभिमानरहित होते हैं, वे ही तीनों लोकोंके उजागर होते हैं ॥५३०॥ कीर्ति करतूतिसे ही होती है । तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ । गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ ॥५३१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि कोई जीव अपने पुरुषार्थके बिना ही मुक्त हो जाता है [ तो उसकी कीर्ति नहीं होती] अजामिल श्रीहरिके लोकको चला गया, परन्तु वह अपनी बदनामीको नहीं धो सका (अब भी उसकी उपमा लोग पापियोंसे ही देते हैं) ॥५३१॥ बड़ोंका आश्रय भी मनुष्यको बड़ा बना देता है बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड । श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मांड ॥५३२॥