दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १७७ भावार्थ—जिस तरह कामकी सरसताके अनुसार लकड़ीके चम्मच या धातुकी करछुलका यथायोग्य संग्रह और त्याग किया जाता है (कहीं लकड़ीके चम्मचसे काम लिया जाता है तो कहीं उसका त्याग करके धातुकी करछुलीकी ही जरूरत पड़ती है) उसी प्रकार अच्छे स्वामी भी विचार करके सब प्रकारके सेवकों तथा सखाओंका यथायोग्य संग्रह और त्याग करते हैं ॥५२६॥ प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान । तुलसी प्रकट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान ॥५२७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मालिकके निकट छोटे, बड़े, निर्बल और बलवान्—सभी प्रकारके लोग रहते हैं। हाथकी अँगुलियोंसे अनुमान करके इस बातको प्रत्यक्ष देख लेना चाहिये (पाँचों अँगुलियाँ एक ही हाथमें हैं, परंतु बराबरकी नहीं हैं) ॥५२७॥ आज्ञाकारी सेवक स्वामीसे बड़ा होता है साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान । राम बाँधि उतरे उदधि लाँघि गए हनुमान ॥५२८॥ भावार्थ—वह सेवक स्वामीसे बड़ा है, जो अपने धर्मपालनमें निपुण है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तो पुल बाँधकर समुद्रके पार उतरे, परंतु हनुमान्जी उसी समुद्रको लाँघकर चले गये ॥५२८॥ मूलके अनुसार बढ़नेवाला और बिना अभिमान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है तुलसी भल बरतरु बढ़त निज मूलहि अनुकूल । सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल ॥५२९॥