दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ दोहावली सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥५२४॥ भावार्थ—यदि मन्त्री, वैद्य और गुरु [अप्रसन्नताके] भयसे या [स्वार्थसाधनकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] 'हाँ' में 'हाँ' मिलाने लगते हैं तो राज्य, धर्म और शरीर—इन तीनोंका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥५२४॥ रसना मंत्री दसन जन तोष पोष निज काज। उदर प्रभु कर पद सेन पदातिक बालक राज समाज ॥५२५॥ भावार्थ—राजा पेट है, मन्त्री जीभ है और अन्य कर्मचारी दांत हैं। जैसे दाँत भोजनको कुचलकर और जीभ उसका स्वाद लेकर तथा अपनी लार साथ लेकर उसे पेटमें पहुँचा देती हैं और पेट रस बनाकर सारे अङ्गोंको पुष्ट और संतुष्ट करता है, उसी प्रकार मन्त्री और अन्य राजकर्मचारी राजाके लिये सब अपना-अपना काम ठीक करते हैं और बदलेमें राजा उन सबका पोषण करता है और उन्हें संतुष्ट करता है। सेना और पदातिजन राजाके हाथ और पैर हैं। जैसे हाथ-पैर पेटकी रक्षा करते हैं और पेट हाथ-पैरको पालता-पोषता है, उसी प्रकार सेना-पदाति राजाकी रक्षा करते हैं और राजा उनका पालन- पोषण करता है। फिर राजा माता-पिताके समान है और सारा राज- समाज राजाका बालक है। जैसे माता-पिता बालकका पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही राजा सारे राजसमाजको पालता-पोषता है ॥५२५॥ लकड़ी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि। सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि ॥५२६॥