भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १७५ भावार्थ—प्रजा, राजसमाज, घर, अपना शरीर, धन, धर्म और सेना आदिको शान्त और सुयोग्य मन्त्रियोंके हाथोंमें सौंप- कर ही राजा नित्य सुखसे रह सकता है (अर्थात् जहाँ मन्त्री शान्त और योग्य नहीं होते; वहाँ राजा सुखसे नहीं रह सकता) ॥५२१॥ मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक । पालइ पोषइ सकल अँग तुलसि सहित बिबेक ॥५२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रधान (राजा) को मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेके लिये तो एक ही है; परंतु विवेकके साथ समस्त अङ्गोंका पालन-पोषण करता है ॥५२२॥ सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ । तुलसी प्रीति की रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥५२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान होने चाहिये और मालिक मुखके समान होना चाहिये । सेवक-स्वामीकी प्रीतिकी रीतिको सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं। (अर्थात् जैसे हाथ, पैर, आंख आदि खाद्य सामग्रियोंके संग्रहमें और विपत्ति पड़ने पर रक्षा करनेमें सहायता करते हैं, उसी प्रकार सेवककी मालिकको सहायता करनी चाहिये । और जैसे मुख सब पदार्थोंको खाता है, परंतु खाकर सब अङ्गोंको यथायोग्य रस पहुँचाता है और उन्हें पुष्ट करता है उसी प्रकार मालिकको सबका पेट भरकर उन्हें शक्तिमान् बनाना चाहिये ॥५२३॥