दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ दोहावली भावार्थ—जिस राजाके हाथमें हाथके गुण (रक्षा करना, दान देना आदि) हों, मनमें मनके गुण (प्रजावत्सलता, उदारता आदि) हों और वचनमें वचनके गुण (मधुरता, सत्यता, हितवादिता आदि) हों उस राजाको विजय, ऐश्वर्य और बुद्धिमत्ता भूलकर भी नहीं छोड़ते ॥५१८॥ गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु । उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु ॥५१९॥ भावार्थ—गोली, साधारण बाण और सुमन्त्रित बाण [के गुणों] को मनमें समझकर और फिंर इनके क्रमको उलटकर देखो और विचार करो कि उत्तम, मध्यम और नीच राजाके वचन क्रमशः ऐसे ही होते हैं, (अर्थात् उत्तम राजाके वचन सुमन्त्रित बाणके समान अमोघ हैं, जो कभी व्यर्थ नहीं जाते; मध्यम राजाके वचन साधारण बाणके समान हैं जो व्यर्थ भी जा सकते हैं और नीच राजाके वचन गोलीके समान होते हैं—उनका शब्द तो बहुत विकराल होता है, परंतु निशाना चूक गया तो काम कुछ भी नहीं होता) ॥५१९॥ सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव । बूढ़त लखि पग डगत लखि चपरि चहूँ दिसि धाव॥५२०॥ भावार्थ—चतुर शत्रु पानीके समान शत्रुरूपी नावको सिरपर रखता है (शत्रुका ऊपरसे बड़ा सत्कार करता है), परंतु उसको डूबते हुए देखकर या पैर डगमगाते हुए देखकर तुरंत ही चारों ओरसे उसपर धावा कर देता है ॥५२०॥ रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु । सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥५२१॥