भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १७३ काँटे बना-बनाकर (स्वयं टूट-टूटकर) गिर पड़ती हैं, इसी प्रकार दुष्ट राजा भी अपनी दुष्ट नीतिसे कुचाल कर-करके संसारमें बार-बार जन्मते-मरते हैं ॥५१४॥ काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल । पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमी पाल ॥५१५॥ भावार्थ—काल (समय) ही गोलंदाज है, पृथ्वी ही तोप है, विकराल अनीति ही बारूद है, पाप ही पलीता है और राजा ही कठोर तथा भारी गोला है (अर्थात् बुरा समय ही दुष्ट राजाके द्वारा प्रजाका नाश कराता है) ॥५१५॥ किसका राज्य अचल हो जाता है ? भूमि रुचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल । धरम राम नय सीय बल अचल होत सुभ काल ॥५१६॥ भावार्थ—पृथ्वी ही रावणकी सुन्दर सभा है, इसमें राजा ही अङ्गदका पैर है, धर्मरूपी राम और नीतिरूपी सीताके बदले ही वह राजारूपी अङ्गदका पैर शुभ समयमें अचल हो जाता है ॥५१६॥ प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ । प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँ ॥५१७॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें जिसकी प्रीति है, [प्रजाहितकी] नीतिमें जो सदा रत है और धर्ममें जिसका स्वाभाविक ही विश्वास है, उस राजाको प्रभुता मन, वचन और शरीरसे कभी नहीं छोड़ती (अर्थात् उसका राज्य सदा बना रहता है) ॥५१७॥ कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि । भूपहि भूलि न परिहरैं बिजय बिभूति सयानि ॥५१८॥