दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ दोहावली रीझि खीझि गुरु देत सिख सखा सुसाहिब साधु । तोरि खाइ फल होइ भल तरु काटें अपराधु ॥५७१॥ भावार्थ—गुरु, मित्र, अच्छे मालिक और साधुजन प्रसन्न होकर या [न माननेपर हमारे हितके लिये] क्रुद्ध होकर यही उपदेश देते हैं कि पका फल ही पेड़से तोड़कर खाना अच्छा है, पेड़को काट डालना अपराध है [राजाको कर उगाहनेके समय यह उपदेश ध्यानमें रखना चाहिये] ॥५७१॥ धरनि धेनु चारितु चरत प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ । हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ की गाइ ॥५७२॥ भावार्थ—पृथ्वीरुपी गौ जब राजाके प्रजावत्सलता तथा धर्म- युक्त उत्तम चरित्ररूपी चारेको चरकर दुग्धवती होती है और जब प्रजारूपी सुन्दर बछड़ेके द्वारा चोंखे जानेपर पेन्हाती है [तभी उत्तम और अधिक दूध मिलता है], सिर्फ पैर बाँधकर दुहनेसे कुछ भी दूध हाथ नहीं लगता ॥५७२॥ चढ़े बबूरैं चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज । करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज ॥५७३॥ भावार्थ—जो दशा बवंडरमें पड़ी हुई पतंगकी और शोकोंके समूहमें पड़े हुए विवेककी होती है (अर्थात् वे नष्ट हो जाते हैं) वही दशा बुरे राज्यमें [सत्] कर्म, [सनातन] धर्म और सुख- सम्पत्तिकी भी समझनी चाहिये ॥५७३॥ कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरि । मरहिं कुनृप करि करि कुनय सों कुचालि भव भूरि ॥५७४॥ भावार्थ—जैसे खजूरकी हजारों शाखाएँ वृक्षमें बहुतेरे