दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ दोहावली भावार्थ—कलियुगमें गोंड़ ( जंगली लोग ) और गँवार तो पृथ्वीके राजा हो रहे हैं और यवन-म्लेच्छादि वादशाह । इनकी राजनीतिमें साम, दान, भेदका प्रयोग न होकर केवल कठोर दण्डका ही प्रयोग होता है ॥५५९॥ फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अठुक पहार । कायर कूर कुपूत कलि घर घर सहस डहार ॥५६०॥ भावार्थ—जैसे पहाड़ की ठोकर लगनेपर [उसपर कुछ भी वश न चलनेसे] मूर्ख लोग [पहाड़के बदले] घरके सिल-लोढ़ेको फोड़ डालते हैं । इस प्रकार अपने ही घरवालोंको तंग करनेवाले कायर, क्रूर और कुपूत कलियुगमें सहस्रोंकी संख्यामें घर-घर होंगे ॥५६०॥ प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान । जेन केन बिधि दीन्हें दान करन कल्यान ॥५६१॥ भावार्थ—सत्य, अहिंसा, शौच और दान—धर्मके ये चार चरण प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलियुगमें एक (दान) ही प्रधान रह गया है, जिस किसी भी प्रकारसे दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ॥५६१॥ कलिजुग सम जुग आन नहिं जौ नर कर बिश्वास । गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥५६२॥ भावार्थ—यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुगके समान और कोई भी युग नहीं है; क्योंकि इसमें केवल श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणसमूहोंका गान करके ही मनुष्य बिना ही किसी परिश्रमके भवसागरसे तर जाता है ॥५६२॥