दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १८३ और चाहे जो भी घट जाय, भगवान्में प्रेम नहीं घटना चाहिये श्रवन घटहुँ पुनि दृग घटहुँ घटउ सकल बल देह । इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह ॥५६३॥ भावार्थ—कानोंसे चाहे कम सुनायी पड़े, आँखोंकी रोशनी भी चाहे घट जाय, सारे शरीरका बल भी चाहे क्षीण हो जाय; किन्तु यदि श्रीहरिमें प्रेम नहीं घटे तो इनके घटनेसे हमारा क्या घट जायगा ? ॥५६३॥ कुसमयका प्रभाव तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन । अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहैं कौन ॥५६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बरसातकी मौसममें कोयल यह समझकर मौन हो जाती है कि अब तो मेढक टर्रायेंगे, हमें कौन पूछेगा ? (बुरा समय आनेपर दुर्जनोंकी ही चलती है, उस समय सज्जन चुप हो रहते हैं) ॥५६४॥ श्रीरामजीके गुणों की महिमा कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाखंड । दहन राम गुन ग्राम जिमि ईंधन अनल प्रचंड ॥५६५॥ भावार्थ—कलियुगके कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल, कपट, दम्भ और पाखण्डको जलानेके लिए श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमुदाय वैसे ही हैं, जैसे ईंधनको जलानेके लिये प्रचण्ड अग्नि ॥५६५॥