दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १८७ सकल धरम बिपरीत कलि कलपित कोटि कुपंथ । पुन्य पराय पहार बन दुरे पुरान सुग्रंथ ॥५५६॥ भावार्थ—कलियुगमें सभी कुछ धर्मके प्रतिकूल हो गया, नये- नये करोड़ों कुमार्ग कल्पित हो गये (वास्तवमें वे मार्ग नहीं हैं मनमानी कल्पनामात्र हैं)। इससे पुण्य तो पहाड़ोंमें भाग गया और पुराणादि सद्ग्रन्थ वनोंमें जाकर छिप गये (अर्थात वनोंमें और पर्वतोंकी गुहाओंमें एकान्तवास करनेवाले कुछ महात्माओंमें ही पुण्य और सद्ग्रन्थोंका पठन-पाठन रह गया है) ॥५५६॥ धातुबाद निरुपाधि बर सदगुरु लाभ सुमीत । देव दरस कलिकाल में पोथिन दुरे सभीत ॥५५७॥ भावार्थ—कलियुगमें रसायनविद्या, उपाधिरहित (अबाधित) वरदान, सद्गुरुकी प्राप्ति, सच्चे मित्र और देवताके प्रत्यक्ष दर्शन—ये पाँचों बातें डरके मारे पुस्तकोंमें छिप गयी हैं (अर्थात् पुस्तकोंहीमें इनके वर्णन मिलते हैं, प्रत्यक्षमें ये दिखलायी नहीं देते) ॥५५७॥ सुर सदननि तीरथ पुरिन निपट कुचालि कुसाज । मनहुँ मवा से मारि कलि राजत सहित समाज ॥५५८॥ भावार्थ—देवालय (मन्दिर), तीर्थ और पवित्र पुरियोंमें सर्वत्र ही अत्यन्त भ्रष्टाचार और भ्रष्ट वातावरण फैल गया है। मानो उन स्थानोंमें कलियुग अपने सारे समाजके (काम, क्रोध दम्भ, लोभ, कपट, दुराग्रह, असत्य, हिंसा, स्तेय, व्यभिचार आदि दोषों एवं दुर्गुणोंके) साथ किलेबंदी करके विराजमान रहता है ॥५५८॥ गोंड़ गवाँर नृपाल महि जमन महा महिपाल । साम न दाम न भेद कलि केवल दंड कराल ॥५५९॥