दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ दोहावली दोहा ब्रह्मग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात । कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥१५२॥ भावार्थ—इस कलियुगमें स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानको छोड़कर दूसरी चर्चा ही नहीं करते, किंतु वे ही [मिथ्या ब्रह्मज्ञानी] लोभवश एक कौड़ीके लिये ब्राह्मण और गुरुजनोंका घात कर डालते हैं [और कहते हैं कि कौन मरता है, कौन मारता है] ॥१५२॥ बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि । जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥१५३॥ भावार्थ—कलियुगमें शूद्रलोग ब्राह्मणोंसे वाद-विवाद करते हैं, और आँख दिखाकर डांटते हुए कहते हैं कि 'क्या हम तुमसे कुछ कम हैं जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं' ॥१५३॥ साखी सबदी दोहरा कहि कहनी उपखान । भगति निरूपहिं भगत कलि निंदहिं बेद पुरान ॥१५४॥ भाव