दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १८५ चोर चतुर बटमार नट प्रभु प्रिय भँडुआ भांड। सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड ॥५४९॥ भावार्थ—कलियुगमें चोर ही चतुर माने जाते हैं (अर्थात् जो सफाईसे दूसरोंका स्वत्व हरण कर लेते हैं, उन्हींको लोग चतुर कहते हैं); लुटेरे ही खिलाड़ी (कलावन्त) गिने जाते हैं (जो मार- पीटकर धन छीन लेते हैं, उनको खिलाड़ी कहा जाता है); भांड और भडुए ही राजाओं या मालिकोंको प्रिय होते हैं (जो खुशामद करके या तरह-तरहकी भाव-भंगियोंसे मूर्ख मालिकोंको रिझाते रहते हैं, वे ही उन्हें प्रिय होते हैं; सत्यवादी सदाचारी नहीं); खान पानका विचार त्यागकर सब कुछ खानेवाले ही महात्मा माने जाते हैं और पाखण्ड ही सन्मार्ग समझा जाता है अर्थात् सभी विपरीत हो रहा है ॥५४९॥ असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग मांहि ॥५५०॥ भावार्थ—जो लोग अशुभ वेष बनाये रहते हैं—अशुभ अलंकार धारण करते हैं तथा खानेयोग्य और न खानेयोग्य सब कुछ खा जाते हैं—इस कलियुगमें वे ही मनुष्य योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही पूज्य हैं ॥५५०॥ सोरठा जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार ते बकता कलिकाल महुँ ॥५५१॥ भावार्थ—जो अपने आचरणसे दूसरोंका बुरा करनेवाले हैं, कलियुगमें उन्हींका गौरव है और वे ही मानके योग्य हैं एवं जो मन, बचन तथा कर्मसे झूठे होते हैं, वे ही वक्ता माने जाते हैं ॥५५१॥