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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

१४६ दोहावली पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लागइ ढेर । सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर ॥४३७॥ भावार्थ—किसी बातके न कहनेसे तो पेट नहीं फूल जाता और कहनेसे सामने बातोंका ढेर नहीं लग जाता । अतएव समय- असमयको समझकर और पवित्र बुद्धिके द्वारा विचार करके ही यथायोग्य वचन बोलने चाहिये ॥ ४३७ ॥ वीतराग पुरुषोंकी शरण ही जगत्‌के जंजालसे बचनेका उपाय है छिद्यो न तरुनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु । तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु ॥४३८॥ भावार्थ—जिनका हृदय न तो युवतियोंके कटाक्ष-बाणोंसे घायल हुआ और न जिन्होंने विषयोंमें कठिन आसक्ति ही की—तुलसीदासजी कहते हैं—उनके शरीरको जगत्‌में अपनी रक्षाके लिये कवच बना लेना चाहिये (अर्थात् ऐसे महापुरुषोंके चरणोंमें रहनेवाले मनुष्य भी विषयोंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं) ॥ ४३८ ॥ शूरवीर करनी करते हैं, कहते नहीं सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु । बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥४३९॥ भावार्थ—शूरवीर तो युद्धमें करनी (शूरवीरताका कार्य) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जनाते । शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर लोग ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं ॥ ४३९ ॥

दोहावली १४७ अभिमानके बचन कहना अच्छा नहीं बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु । प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहि हेतु ॥४४०॥ भावार्थ—एक समय [श्रीरामचन्द्रजीकृत रामेश्वरके पत्थरके] सेतुबन्धको देखकर अर्जुनने अभिमानके बचन कहे [कि श्रीरामजीने इतना प्रयास क्यों किया ? मैं उस समय होता तो सारा पुल बाणोंसे ही बाँध देता । इस अभिमान का फल यह हुआ कि] भगवान् श्रीकृष्णके परिवारकी स्त्रियोंको [हस्तिनापुर ले जाते समय] नीच भरोंने [उनको] लूट लिया, अर्जुन उनको जीत नहीं सके और इस अपमानसे उनका मरण हो गया [अतएव अभिमानके बचन किसीसे नहीं कहने चाहिये ]॥ ४४० ॥ दीनोंकी रक्षा करनेवाला सदा विजयी होता है राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज । मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज ॥४४१॥ भावार्थ—गरीबोंपर कृपा करनेवाले श्रीराम-लक्ष्मण वनमें रहते हुए भी विजयी हुए, परंतु बकवादी बालि और रावण अपने घरमें ही सारे समाजसहित नष्ट हो गये ॥ ४४१ ॥ नीतिका पालन करनेवालेके सभी सहायक बन जाते हैं खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल । कुमति बालि दसकंठ घर सुहृद बंधु कियो काल ॥४४२॥ भावार्थ—नीतिके पालनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने वनमें भी पक्षियों (जटायु आदि) और पशुओं (वानर-भालुओं) को अपना पवित्र (सच्चा) मित्र बना लिया; परंतु बालि और रावणने घरमें ही

१४८ दोहावली अपने हितैषी भाइयोंको (सुग्रीव और विभीषणको) अपना काल बना लिया ॥ ४४२ ॥ सराहनेयोग्य कौन है ? लखइ अघानो भूख ज्यों लखइ जीतिमें हारि । तुलसी सुमति सराहिये मग पग धरइ बिचारि ॥४४३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो भूखमें (अभावमें) भी अपनेको तृप्तके समान समझता है और जीतमें भी अपनी हार मानता है—इस प्रकार जो खूब विचार-विचारकर मार्गपर पैर रखता है, वह बुद्धिमान् हीं सराहनेयोग्य है। अभावका अनुभव करनेसे ही कामना होती है और कामना ही पापकी जड़ है; अतएव जो सदा अपनेको तृप्त, पूर्णकाम मानता है, उसके द्वारा पाप नहीं होते। इसी प्रकार अपनी विजय माननेसे अभिमान बढ़ता है, जो पतनका हेतु होता है। अतएव जो पुरुष प्रत्येक क्रियामें और फलमें अभिमानका त्याग कर विचारपूर्वक दोषोंसे बचता रहता है, वही बुद्धिमान् है और वही प्रशंसनीय है) ॥ ४४३ ॥ अवसरपर चूक जानेसे बड़ी हानि होती है लाभ समयको पालिबो हानि समय की चूक । सदा बिचारहिं चारुमति सुदिन कुदिन दिन दूक ॥४४४॥ भावार्थ—अनुकूल समय आनेपर काम बना लेना ही लाभ है और समयपर चूक जाना ही हानि है। इसीलिये सुन्दर बुद्धिवाले लोग इस बातका सदा विचार किया करते हैं, क्योंकि अच्छा और बुरा समय दो ही दिनका होता है। [अतएव समयपर चूक जाना बुद्धिमानी नहीं है।] (तात्पर्य यह है कि मनुष्य-जीवनका यह अवसर भगवद्भजनके लिये ही मिला है। इस समय जो चूक

दोहावली १४९ जायगा—भगवान्‌को नहीं भजेगा, उसे मनुष्य-जीवनके परम लाभसे वञ्चित होकर बड़ी हानि सहनी पड़ेगी) ॥४४४॥ समयका महत्त्व सिंधु तरन कपि गिरि हरन काज साईँ हित दोउ । तुलसी समयहिं सब बड़ो बूझत कहूँ कोउ कोउ ॥४४५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—समयपर काम करनेसे ही सब बड़े होते हैं, इस रहस्यको कहीं कोई-कोई ही जानते हैं। श्रीहनुमान्‌जीने [सीताका संदेश लानेके लिये] समुद्रको लांघना और [ श्रीलक्ष्मणजीकी मूर्च्छा दूर करनेके लिये ] द्रोण-पर्वतको लाना—ये दोनों काम अपने स्वामीके हितके लिये ठीक समयपर ही किये थे। (समुद्र लांघना और पहाड़ उठाना हनुमान्‌जीके लिये साधारण बात थी, परंतु ठीक समयपर होनेसे ही इनकी इतनी महिमा हुई।) ॥ ४४५ ॥ तुलसी मीठी अमी तें मागी मिलै जो मीच । सुधा सुधाकर समय बिनु कालकूट तें नीच ॥४४६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि समयपर (जिस समय मनुष्य दुःखसे सन्तप्त होकर घबड़ा उठता है) माँगनेसे मौत भी मिल जाय तो वह अमृतसे अधिक मीठी मालूम होती है। परंतु बिना अवसरके अमृत या चन्द्रमा भी मिलें तो वे कालकूट जहरसे भी अधिक बुरे लगते हैं॥४४६॥ विपत्तिकालके मित्र कौन हैं? तुलसी असमय के सखा धीरज धरम बिबेक । साहित साहस सत्यब्रत राम भरोसो एक ॥४४७॥

१५० दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि धीरज, धर्म, विवेक, सत्- साहित्य, साहस और सत्यका व्रत अथवा एकमात्र श्रीरामका भरोसा— बुरे समयके (विपत्तिकालके) यही मित्र हैं ॥४४७॥ समरथ कोउ न राम सो तीय हरन अपराधु । समयहिं साधे काज सब समय सराहहिं साधु ॥४४८॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समान तो कोई सामर्थ्य- वान् नहीं (जो होनी-अनहोनी सब कुछ कर सकते हैं) और सीताहरणके समान भयंकर, अपराध कोई क्या करेगा। इसपर भी श्रीरामजीने उस समय रावणको न मारकर उचित समयपर ही सब काम किये। इसीलिये साधुलोग समयकी सराहना करते हैं ॥४४८॥ तुलसी तीरहु के चलें समय पाइबी थाह । धाइ न जाइ थहाइबो सर सरिता अवगाह ॥४४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नदी या सरोवरके किनारे- किनारे चलनेसे ही समयपर उनकी थाह मिल जायगी; अगाध तालाब या नदियोंकी थाह लेनेके लिये दौड़कर उनके अंदर घुस नहीं जाना चाहिये (समयकी प्रतीक्षा करनी चाहिये) ॥४४९॥ होनहारकी प्रबलता तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ । आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहाँ लै जाइ ॥४५०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जैसी होनहार होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह स्वयं उसके पास आती है या उसे वहाँ ले जाती है ॥४५०॥

दोहावली १५१ परमार्थप्राप्तिके चार उपाय कै जूझिबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस । चारि चारु परलोक पथ जथा जोग उपदेस ॥४५१॥ भावार्थ—परलोकके लिये सुन्दर चार मार्ग हैं और [अधिकार- भेदसे] इनका यथायोग्य उपदेश किया गया है—[वेदाध्ययनादिके द्वारा] ज्ञान अर्जन करना (ब्राह्मणके लिये), [सम्मुख समर- में] युद्ध करना (क्षत्रियके लिये), [व्यापारमें धन कमाकर] दान देना (वैश्यके लिये) और शरीरसे कष्ट सहकर सेवा करना (शूद्रके लिये) ॥४५१॥ विवेककी आवश्यकता पात पात को सींचिबो न करु सरग तरु हेत । कुटिल कटुक फर फरैंगो तुलसी करत अचेत ॥४५२॥ भावार्थ—कल्पवृक्ष [से फल] पानेके लिये पत्ते-पत्तेको (हर किसी पेड़को) मत सींचा करो, ऐसा करोगे तो ऐसा टेढ़ा और कड़ुआ फल फलेगा जो तुमको अचेत कर देगा (अर्थात् परम सुखरूप मनोरथकी पूर्तिके लिये बिना समझे-सोचे जैसे-तैसे कर्म मत किया करो; ऐसा करनेसे सुख तो मिलेगा ही नहीं, उल्टे बुरे कर्मोंके फलस्वरूप महान् दुःखोंकी प्राप्ति होगी, जिससे रहा-सहा विवेक भी नष्ट हो जायगा) ॥४५२॥ विश्वासकी महिमा गठिबँध ते परतीति बड़ि जेंहिं सबको सब काज । कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज ॥४५३॥ भावार्थ—गठबन्धनसे भी विश्वास बड़ा है, जिससे सब लोगों- के सब काम होते हैं। कहनेमें सब बात छोटी-सी है, परंतु

१५२ दोहावली समझनेसे बहुत बड़ी है। जिस प्रकार अनाजके थोड़े-से दाने मिट्टीमें गाड़ दिये जाते हैं, परंतु वही अनाज पैदा होनेपर बहुत बढ़ जाता है ॥४५३॥ अपनो ऐपन निज हथा लिय पूजहिं निज भीति। फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति ॥४५४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि स्त्रियाँ अपने घरकी दीवारपर अपने ऐपनके (चावल और हल्दीको एक साथ पीसकर बनाये हुए रंगके) अपने ही हाथे छापकर उनको पूजती हैं और उसीसे उनकी सारी मनः कामनाएँ पूरी हो जाती हैं। यह प्रेम और विश्वासका ही फल है ॥४५४॥ बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु। तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु ॥४५५॥ भावार्थ—सूर्य स्वयं [पृथ्वीपर अपार] जल बरसाता है और सोखता है, परंतु लोगोंके दिये हुए अर्घ्य (थोड़े-से जल) से बड़ा प्रसन्न होता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि साधु और देवता सब स्नेह और सम्मान ही चाहते हैं ॥४५५॥ बारह नक्षत्र व्यापारके लिये अच्छे हैं श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हय रेवती सखाउ। देहि लेहि धन धरनि धरु गएहुँ न जाइहि काउ ॥४५६॥ भावार्थ—श्रवणनक्षत्रसे तीन नक्षत्र (श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष), हस्त नक्षत्रसे तीन नक्षत्र (हस्त, चित्रा, स्वाती), 'पु' से आरम्भ होनेवाले दो नक्षत्र (पुष्य, पुनर्वसु) और मृगशिरा, अश्विनी, रेवती तथा अनुराधा—इन बारह नक्षत्रोंमें धन, जमीन और धरोहरका

दोहावली १५३ लेन-देन करो; ऐसा करनेसे धन जाता हुआ प्रतीत होनेपर भी नहीं जायगा ॥ ४५६ ॥ चौदह नक्षत्रोंमें हाथसे गया हुआ धन वापस नहीं मिलता ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ । हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ ॥४५७॥ भावार्थ—'उ'से आरम्भ होनेवाले तीन नक्षत्र (उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद), 'पू'से आरम्भ होनेवाले तीन नक्षत्र (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद), वि (विशाखा), अज (रोहिणी), कृ (कृत्तिका), म (मघा), आ (आर्द्रा)' भ (भरणी), अ (अश्लेषा) और मू (मूल) को भी इन्हींके साथ समझ लो—इन चौदह नक्षत्रोंमें हरा हुआ (चोरी गया हुआ), धरोहर रखा हुआ, गाड़ा हुआ तथा उधार दिया हुआ धन फिर लौटकर हाथ नहीं आता ॥ ४५७ ॥ कौन-सी तिथियाँ कब हानिकारक होती हैं रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि*प्रथमादिक बार । तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार ॥४५८॥ भावार्थ—द्वादशी, एकादशी, दशमी, तृतीया, षष्ठी, द्वितीया, सप्तमी—ये सातों तिथियाँ यदि क्रमसे रवि, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनिवारको पड़ें तो ये सब कामोंको बिगाड़ने- वाली होती हैं और यह कुयोग समझा जाता है ॥ ४५८ ॥ *रवि बारह, हर (रुद्र) ग्यारह, दिशाएँ दश, गुण तीन, रस छः, नेत्र दो और ऋषि-मुनि सात हैं। इन्हींसे तिथियोंका वर्णन है।

१५४ दोहावली कौन-सा चन्द्रमा घातक समझना चाहिये ? ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु । * मेषादिक क्रम तें गनहि घात चंद्र जियँ जानु ॥४५९॥ भावार्थ—मेषके प्रथम, वृषके पाँचवें, मिथुनके नवें, कर्कके दूसरे, सिंहके छठे, कन्याके दसवें, तुलाके तीसरे, वृश्चिकके सातवें, धनके चौथे, मकरके आठवें, कुम्भके ग्यारहवें और मीन राशिके बारहवें चन्द्रमा पड़ जायें तो उसे घातक समझो ॥ ४५९ ॥ किन-किन वस्तुओंका दर्शन शुभ है ? नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चक चाष । दस दिसि देखत सगुन सुभ पूजहिं मन अभिलाष ॥४६०॥ भावार्थ—नेवला, मछली, दर्पण, क्षेमकरी चिड़िया (सफेद मुँहवाली चील्ह), चकवा तथा नीलकंठ—इन्हें दसों दिशाओंमेंसे किसी ओर भी देखना शुभ शकुन है और इससे मनकी अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं ॥ ४६० ॥ सात वस्तुएँ सदा मंगलकारी हैं ? सुधा साधु सुरतरु सुमन सुफल सुहावनि बात । तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात ॥४६१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अमृत, साधु, कल्पवृक्ष, पुष्प, सुन्दर फल, सुहावनी बात और श्रीजानकीनाथजीकी भक्ति—ये सात सुन्दर मङ्गलकारी शकुन हैं ॥ ४६१ ॥ श्रीरघुनाथजीका स्मरण सारे मंगलोंकी जड़ है भरत सत्रुसूदन लखन सहित सुमिरि रघुनाथ । करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ ॥४६२॥

  • शशि—चन्द्रमा एक, सर—बाण पाँच, फल चार, वसु आठ होते हैं ।

दोहावली १५५ भावार्थ—भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके सब शुभ साधनोंके द्वारा कार्य करो तो साथ-ही-साथ सुन्दर मङ्गल भी मिलता जायगा (अर्थात् मनोरथ सफल होते जायेंगे) ॥ ४६२ ॥ यात्राके समयका शुभ स्मरण राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान । लछि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान ॥४६३॥ भावार्थ—श्रीविश्वामित्रजीसहित श्रीरामलक्ष्मणका स्मरण करके यात्रा करो और लक्ष्मीका लाभ लेकर जगत्में यश लो। यह शकुन सच्चा मङ्गलमय है ॥ ४६३ ॥ वेदकी अपार महिमा अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार । जो निंदत निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥४६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विचार करनेपर यही सिद्ध होता है कि वेदकी महिमा अतुलनीय है, जिसकी निन्दा करनेसे स्वयं भगवान्‌का बुद्धावतार भी निन्दित हो गया, यह सबको विदित है ॥ ४६४ ॥ बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच । तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच ॥४६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि पण्डितगण किसान हैं और वेद सरोवर है, इसीसे जल ले-लेकर सब अपने-अपने मतरूपी खेतको सींचते हैं, इनमें कौन-सा खेत [मत] उत्तम है और कौन-सा मध्यम या नीच है, इसका पता खेती [उत्तम, मध्यम और नीच फल और विस्तार] देखकर लगाना चाहिएं ॥ ४६५ ॥

१५६ दोहावली धर्मका परित्याग किसी भी हालतमें नहीं करना चाहिये सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान । तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान ॥४६६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बुरे वचनोंको और सब प्रकारके कष्टोंको सह लो तथा मिथ्या अपमानको भी अङ्गीकार कर लो, परंतु धर्मको मत छोड़ो। श्रेष्ठ बुद्धिमान् पुरुष ऐसा ही उपदेश और आचरण कर गये हैं ॥ ४६६ ॥ दूसरेका हित ही करना चाहिए, अहित नहीं अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि । तुलसी चारु बिचारु भल करिअ काज सुनि जानि ॥४६७॥ भावार्थ—दूसरेका हित करनेमें तो अपने अहितका केवल भय ही रहता है; परंतु दूसरेका अहित करनेमें अपने हितका नाश होता ही है। इसलिये तुलसीदासजी कहते हैं कि यहाँ यही विचार सुन्दर और मङ्गलकारक है कि जान-सुनकर (सोच-समझकर) काम करना चाहिये (पराये हितका ही काम करना चाहिये

दोहावली १५७ नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक। तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक ॥४६९॥ भावार्थ—नीतिपथपर चलना और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेमका निबाहना (अटूट प्रेम करना) ही उत्तम है। तुलसीदासजी कहते हैं कि वस्त्र वही पहनना चाहिये, जिसका रंग धोनेपर भी फीका न पड़े ॥४६९॥ दोहा चारु बिचारु चलु परिहरि बाद बिबाद। सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद ॥४७०॥ भावार्थ—उपर्युक्त दोहेको अच्छी तरह विचार लो (अर्थात् नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम कभी न छोड़ो) [अथवा वाद-विवाद छोड़कर दो 'हा' अर्थात् हाहा खाना—सबसे विनीत रहना ही सुन्दर विचार है] और वाद-विवाद छोड़कर चलो, [चाहे कोई कुछ भी कहे]। बस, यही पुण्यकी सीमा है, यही स्वार्थ- की अवधि है और यही परमार्थकी—भगवत्प्राप्तिकी मर्यादा है ॥४७०॥ विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान। जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान ॥४७१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि वही पुरुष सामर्थ्यवान्, बुद्धिमान्, पुण्यात्मा, साधु और चतुर है जो आयके अनुमानसे ही व्यय करता है और जगत्में विचारपूर्वक व्यवहार करता है ॥४७१॥

१५८ दोहावली जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि। बिनुअपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर लाखि ॥४७२॥ भावार्थ—जगत्‌में योगकी (अर्थात् प्राप्त हुए धन, ऐश्वर्य, शक्ति या अधिकारकी) रक्षा किये बिना अर्थात् उसका सदुपयोग न करके दुरुपयोग करनेसे वह नष्ट हो जाता है। [जिनके प्रति दुरुपयोग होता है उनका तो कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि] तुलसी दासके हितैषी श्रीरामजी निरपराधोंकी रक्षा करते ही हैं। इसमें परशुराम, नहुष, वेन और वृकासुर (भस्मासुर) साक्षी हैं। (परशु- रामजीने अपने बलका क्षत्रियोंके नाशमें दुरुपयोग किया; परन्तु अन्तमें क्षत्रियवंश बच गया और परशुरामजीका बल क्षत्रियशरीरधारी भगवान् श्रीरामजीद्वारा हरा गया। राजा नहुषको पुण्यबलसे जब इन्द्रका सिंहासन प्राप्त हुआ, तब इन्द्रपत्नी शचीके साथ सम्भोगकी इच्छा करके नहुषने अधिकारका दुरुपयोग किया, जिसके फलस्वरूप सप्तर्षियोंके शापसे उनको स्वर्गसे गिरना पड़ा और निरपराध शचीके सतीत्वकी रक्षा हो गयी। वेनने अपने अधिकारका दुरुपयोग करके धर्मका नाश करना आरम्भ किया; परन्तु धर्म तो नष्ट नहीं हुआ; ऋषियोंके शापसे स्वयं वेनको ही मरना पड़ा। वृकासुर (भस्मासुर) शिवजीसे वरदान पाकर ऐसा बौराया कि उसने अपने वरदाता शिवजीको ही जला देना चाहा। अन्तमें भगवान् विष्णुकी चतुराईसे वह स्वयं जल गया) ॥४७२॥ नेमसे प्रेम बड़ा है बड़ि प्रतीति गठबंधन तें बड़ो जोग तें छेम। बड़ो सुसेवक साईं तें बड़ो नेम तें प्रेम ॥४७३॥ भावार्थ—बाहरी ग्रन्थि-बन्धनकी अपेक्षा विश्वास बड़ा है। योग-

से क्षेम बड़ा है। स्वामीकी अपेक्षा श्रेष्ठ सेवक बड़ा है और नियमोंसे प्रेम बड़ा है ॥४७३॥

किस-किसका परित्याग कर देना चाहिये

सिष्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच। सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच ॥४७४॥ भावार्थ—यदि यह बात सुननेमें आवे कि अपना शिष्य, मित्र, नौकर, मन्त्री और सुन्दरी स्त्री—ये पाँचों मुझको छोड़कर दूसरेके मनको प्रसन्न करने लगे हैं तो पहले तो इसकी जाँच करनी चाहिये और [जाँच करनेपर यदि बात सत्य निकले तो] फिर इन्हें छोड़ देना चाहिये ॥४७४॥

सात वस्तुओंको रस बिगड़नेसे पहले ही

छोड़ देना चाहिये

नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार। सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार ॥४७५॥ भावार्थ—नगर, स्त्री, भोजन, मन्त्री, सेवक, मित्र और घर— इनकी सरसता नष्ट होनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देनेमें शोभा और आनन्द है। नीरस होनेपर इनका त्याग करनेमें तो शोक और अशान्ति ही होती है ॥४७५॥

मनके चार कण्टक हैं

तूठहिं निज रुचि काज करि रूठहिं काज बिगारि। तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि ॥४७६॥ भावार्थ—स्त्री, पुत्र, सेवक और मित्र जब अपनी रुचिके अनु- सार कार्य करनेमें ही सन्तुष्ट होते हैं (अपनी रुचिके प्रतिकूल किसीकी १

१६० दोहावली बात नहीं सुनते) और मनमानी करके आप ही काम बिगाड़ लेते हैं तथा फिर रूठ भी जाते हैं, तब ये चारों मनको काँटेके समान चुभने लगते हैं ॥४७६॥ कौन निरादर पाते हैं ? दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग। तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग ॥४७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि प्राणके समान प्यारे होने- पर भी बहुत दिनोंके रोगी, दरिद्र, कटु वचन बोलनेवाले और लालची—ये चारों निरादरके योग्य हो जाते हैं ॥४७७॥ पाँच दुःखदायी होते हैं पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत। बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत ॥४७८॥ भावार्थ—पाही खेती (जिस गाँवमें रहते हों उससे दूर जाकर दूसरे गांवमें खेती करना), राह चलते मनुष्यमें आसक्ति, बुरे, (बहुत अधिक) ब्याजकी कर्जदारी, रास्तेपरका खेत और अपनी अपेक्षा बड़ेसे वैर—ये पाँचों काम करनेसे ( अवश्य ही ) दुःखके कारण होते हैं ॥४७८॥ समर्थ पापीसे वैर करना उचित नहीं धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु। समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु ॥४७९॥

भावार्थ—जिस तरह लोहा चावसे दौड़कर चुम्बकसे लग जाता है, उसी तरह नीच मनुष्य [कपटभरी] नम्रता प्रदर्शित कर खींच लेता है। इसी प्रकार समर्थ पापीसे बैर करनेको खरीदी हुई मौत समझो ॥ ४७९ ॥ सोचनीय कौन है सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥४८०॥ भावार्थ—वह गृहस्थ सोचनीय है, जो मोहवश शास्त्रोक्त कर्म- मार्गका त्याग कर देता है और वह संन्यासी सोचनीय है जो संसारमें आसक्त और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ॥ ४८० ॥ परमार्थसे विमुख ही अंधा तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि। अंध कहें दुख पाइहैं डिठिआरो केहि डीठि ॥४८१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य स्वार्थके तो (सम्मुख) शरण हो रहा है और परमार्थकी ओर जिसने पीठ कर रक्खी है (अर्थात् भगवान्‌से विमुख होकर जो केवल विषयोंमें रत है) वह अन्धा कहनेपर तो मनमें दुःख पायेगा, परंतु किस आँख- को लेकर उसे आँखवाला कहा जाय ? (अर्थात् आँख हुए बिना उसे आँखवाला कहें भी कैसे ? हृदयमें विवेकरूपी असली आँख होती तो वह भगवान्‌के सम्मुख होनेमें ही अपना कल्याण देखता और भयंकर विषयोंका मोह छोड़ देता) ॥ ४८१ ॥ दोहा० ११-१२—

४. दोहा ४५१-५७३: राम-गुणगान, परमार्थ-तत्त्व एवं ग्रन्थ-उपसंहार

१६२ दोहावली मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय। चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय ॥४८२॥ भावार्थ—विना आँखवाली जूती पैरको देखकर पहचान लेती है; किंतु इन नर-नारियोंके चार-चार आँखें (दो बाहरकी और मन- बुद्धिरूप दो भीतरकी) होनेपर भी इन्हें मौत और माया नहीं सूझती ! ॥ ४८२ ॥ मूढ़ उपदेश नहीं सुनते जौ पै मूढ़ उपदेश के होते जोग जहान। क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान ॥४८३॥ भावार्थ—यदि मूर्ख मनुष्य संसारमें उपदेशके योग्य होते तो परम चतुर भगवान् श्रीकृष्ण दुर्योधनको क्यों न समझा सके ? ॥ ४८३ ॥ सोरठा फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥४८४॥ भावार्थ—यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं तो भी बेंत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार यदि ब्रह्माके समान भी [ज्ञानी] गुरु मिल जायँ तो भी मूर्खके हृदयमें ज्ञान नहीं होता ॥ ४८४ ॥ दोहा रीझि आपनी बूझि पर खीझि बिचार बिहीन। ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन ॥४८५॥. CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

भावार्थ—अपनी ही समझ (बुद्धि) पर जिनकी प्रीति है (अपनी ही समझको जो सबसे उत्तम मानते हैं) और जिनका रोष नासमझीको लिये हुए होता है; वे मोहके महान् समुद्रमें मछली बने हुए लोग किसीका उपदेश नहीं मानते ॥ ४८५ ॥ बार-बार सोचनेकी आवश्यकता अनसमझें अनुसोचनो अवसि समुझिए आपु । तुलसी आपु न समुझिए पल पल पर परितापु ॥४८६॥ भावार्थ—किसी बातको न समझनेपर उसे बार-बार सोचना चाहिये, ऐसा करनेसे वह बात अपने-आप समझमें आ जायगी। तुलसीदासजी कहते हैं कि वह स्वयं समझमें नहीं आयी तो [उसके अनुसार आचरण करनेसे] क्षण-क्षणमें दुःख होगा ॥ ४८६ ॥ मूर्खशिरोमणि कौन हैं ? कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर । बवाँहि नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर ॥४८७॥ भावार्थ—जो लोग घर जलनेपर कुँआ खोदते हैं, शत्रुके चढ़ आनेपर [किले की रक्षाके लिये चारों ओर] बबूलके वृक्ष रोपना शुरू करते हैं और स्वार्थसाधनके लिये [भगवान्‌को छोड़कर जहाँ-तहाँ] सिर नवाते फिरते हैं, वे मूर्खोंके शिरोमणि और निकम्मे (दीर्घसूत्री और प्रमादी) हैं ॥ ४८७ ॥ ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है निडर ईस तें बीस कें बीस बाहु सो होइ । गयो गयो कहँ सुमति सब भयो कुमति कह कोइ ॥४८८॥

१६४ दोहावली भावार्थ—ईश्वरका डर छोड़कर चाहे कोई बीसों विस्वे (निश्चय ही) रावणके समान [प्रभावशाली] क्यों न हो जाय, बुद्धिमान् लोग तो उस ईश्वरविमुखको गया-गया ही (नष्ट ही हुआ) कहेंगे; कोई कुबुद्धिवाला ही उसे उन्नतिको प्राप्त हुआ बतलावेगा ॥ ४८८ ॥ जान-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ है जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहै जु सोइ । उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होइ ॥४८९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो [सब बात] सुन- समझकर भी (जान-बूझकर) अनीतिमें लगा रहता है और जागते हुए भी सो रहता है, उसको उपदेश देना या जगाना उचित नहीं है अर्थात् व्यर्थ है ॥ ४८९ ॥ बहु सुत बहु रुचि बहु बचन बहु अचार व्यवहार । इनको भलो मनाइबो यह अग्यान अपार ॥४९०॥ भावार्थ—जिनके बहुत पुत्र हों, जिनकी [भाँति-भाँतिकी] अनेकों इच्छाएँ हों, जो तरह-तरहकी बातें बनाते हों, जिनके आचरण और व्यवहार अनेकों प्रकारके हों उनकी भलाई चाहना महान् मूर्खता है (अर्थात् उनका कल्याण होना बहुत ही कठिन है) ॥ ४९० ॥ जगत्‌के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस । करत गगन को गँडुआ सो सठ तुलसीदास ॥४९१॥

भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो आदमी [दूसरोंके द्वारा] अपना भला होनेकी आशासे [भगवान्को छोड़कर जगत्के] लोगोंको रिझाता रहता है, वह मूर्ख आकाशका तकिया बनाना चाहता है ॥४९१॥ अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह । तुलसी लोग रिझाइबो करषि कातिबो नान्ह ॥४९२॥ भावार्थ—क्या श्रीजानकीजी अपयशके योग्य थीं और क्या श्रीकृष्णने मणिकी चोरी की थी ? कदापि नहीं। अतएव तुलसी- दासजी कहते हैं कि सब लोगोंको प्रसन्न करना उतना ही कठिन है जितना जोरसे खींचकर बारीक सूत कातना ! ॥४९२॥ तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ । तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रघुराउ ॥४९३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि लोगोंके सन्देहको दूर करनेका कोई उपाय होता तो क्या श्री रघुनाथजी श्रीजानकीजी- को अपने मनमें [सर्वथा निष्कलङ्क] जानते हुए भी उनका त्याग करते ? ॥४९३॥ प्रतिष्ठा दुःखका मूल है मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि । पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बढ़ी रारि ॥४९४॥ भावार्थ—जबतक मधुकरी माँगकर खाते थे, तबतक पैर पसार- कर (निश्चिन्त रूपसे) सोते थे । परन्तु इधर यह पापमयी प्रतिष्ठा बढ़ गयी, इसीसे झगड़ा (झंझट) भी बढ़ गया ॥४९४॥ तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान । उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान ॥४९५॥