भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१२६ दोहावली सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न-भिन्न प्रकार बिरुचि परखिए सुजन जन राखि परखिए मंद । बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद ॥३७४॥ भावार्थ—संतोंकी परख तो हमारी रुचिके बिना ही हो जाती है (उनके सरल पवित्र स्वभावसे और उनकी कृपासे हमारे बिना ही प्रयत्न उनका परिचय मिल जाता है), परंतु दुष्ट मनुष्यकी परीक्षा कुछ दिन पास रखकर करनी पड़ती है (सहज ही उसके कपटको पहचानना कठिन होता है)। बड़वानल समुद्रमें बहुत दिन रहनेके बाद समुद्रके जलको सोखता है, परंतु चन्द्रमा दर्शन देते ही समुद्रके हर्षको बढ़ाता है ॥३७४॥ नीच पुरुषकी नीचता प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल । रबिरुख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल ॥३७५॥ भावार्थ—मालिकके अनुकूल होनेपर नीच मनुष्य [अभिमानके मारे] एकदम भयंकर बन जाते हैं। जैसे दर्पण और स्फटिक सूर्यकी रुख अपनी तरफ देखकर आगकी लपटें उगलने लगते हैं ॥३७५॥ सज्जनकी सज्जनता प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार । लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि ॥३७६॥ भावार्थ—मालिकके पास रहनेसे सज्जन पुरुष सबको सुख देने- वाले हो जाते हैं, इस बातको अच्छी तरह विचार लो। बादलका जीवन खारे समुद्रका जल है; परंतु वह दूसरोंके लिये [खारा जल न देकर] सुन्दर अमृतके समान जल बरसाता है ॥३७६॥