दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १२७ नीच निरावहिं निरस तरु तुलसी सींचहिं ऊख। पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख ॥३७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच मनुष्य रसहीन (सूखे) वृक्षोंको तो खेतसे उखाड़ फेंकते और रसवाले ऊखको सींचते हैं; परंतु बादल (जल बरसाकर) विष और अमृत दोनों प्रकारके वृक्षोंका समानरूपसे पोषण करता है ॥३७७॥ बरषि बिस्व हरषित करत हरत ताप अघ प्यास। तुलसी दोष न जलद को जो ज़ल जरै जवास ॥३७८॥ भावार्थ—बादल तो बरसकर समस्त विश्वको प्रसन्न करता है और सबके ताप (गर्मी), दुःख और प्यासको हरण करता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि उसके जलसे जवासा जल जाय तो इसमें बादलका कोई दोष नहीं है॥३७८॥ अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं। तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं ॥३७९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दाता अमर रहते हैं (उनकी कीर्ति संसारमें बनी रहती है) और याचक मरते हैं (मांगना मरनेके तुल्य ही है), बार-बार मरते हैं और बार-बार दान लेते हैं। फिर भी वे पापी याचक दाताको सदा दोष ही देते रहते हैं ॥३७९॥ नीचनिन्दा लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़। गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़ ॥३८०॥ भावार्थ—हाथीको देखकर कुत्ता सूखे हाड़को लेकर दौड़ जाता है (समझता है, कहीं हाथी इस हाड़को छीन न ले)। वह मूर्ख हाथीके गुण, मूल्य, आहार और बलकी महिमाको क्या जाने ? ३८०॥