दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ दोहावली सज्जनमहिमा कें निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर । हरष विषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार ॥३८१॥ भावार्थ—कुत्ते और सियार सिंहका निरादर करें, चाहे आदर करें, हाथीको पछाड़नेवाले सिंहको इससे कोई हर्ष या शोक नहीं होता (वह कुत्ते-सियारोंकी ओर ताकता ही नहीं) ॥३८१॥ दुर्जनोंका स्वभाव ठाढ़ो द्वार न दै सकें तुलसी जे नर नीच । निंदहिं बलि हरिचंद को का कियो करन दधीच ॥३८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य नीच प्रकृतिके हैं, वे स्वयं तो द्वारपर खड़े हुए भिक्षुकको कुछ भी नहीं दे सकते, परंतु बलि और हरिश्चन्द्रकी निन्दा करते हैं और कहते हैं कि कर्ण और दधीचिने कौन बड़ा काम किया था ? ॥३८२॥ नीचकी निन्दासे उत्तम पुरुषोंका कुछ नहीं घटता ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग । स्वान सरावन के कहें लघुता लहै न गंग ॥३८३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिन श्रीगङ्गाजीकी निर्मल और तरल तरङ्गें भगवान् श्रीशंकरके मस्तकपर शोभा पाती हैं, उन श्रीगङ्गाजीकी महिमामें कुत्ते और सरावगियोंके कहनेसे कुछ कमी नहीं हो जाती ॥३८३॥ तुलसी देवल देवको लागे लाखि करोरि । काक अभागें हगि भरयो महिमा भई कि थोरि ॥३८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिस देवमन्दिरके बनवानेमें