भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १२९ लाखों-करोड़ों रुपये लगे हों, उसमें यदि अभागे कौएने बीट कर दी तो इससे उस मन्दिरकी महिमा थोड़े ही घट गयी (वह तो ज्यों- की-त्यों बनी रहती है) ॥ ३८४ ॥ गुणोंका ही मूल्य है, दूसरोंके आदर-अनादरका नहीं निज गुन घटत न नाग नग परखि परिहरत कोल। तुलसी प्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल ॥३८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जंगली कोललोग गजमुक्ता- को परखकर फेंक देते हैं, इससे उसका गुण घट नहीं जाता। इसके विपरीत भगवान् श्रीकृष्णने गुंजा (घुंघची) के गहने बनाकर पहने, परंतु इससे उनकी कीमत बढ़ नहीं गयी ॥ ३८५ ॥ श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमाको कोई नहीं पा सकता राकापति षोड़स उअहिँ तारा गन समुदाइ। सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥३८६॥ भावार्थ—चाहे चन्द्रमा समस्त तारागणको साथ लेकर और सोलह कलाओंसे पूर्ण होकर उदय हो जाय और साथ ही सभी पहाड़ोंमें आग भी लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती ॥ ३८६ ॥ दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुई निन्दा-स्तुतिका कोई मूल्य नहीं है भलो कहहिँ बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद। ते नर गाडुर जानि जियँ करिय न हरष बिषाद ॥३८७॥ भावार्थ—जो लोग बिना ही जाने-सुने किसीको भला बताने लगते हैं और बिना ही जाने किसीकी निन्दा करने लगते हैं, उन दोहा० ६-१०—