दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १२५ भावार्थ—रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसीलिये अत्यन्त अपवित्र कीड़ोंको भी सब लोग प्राणोंके समान पालते हैं ॥३७०॥ दोहा जो जो जेहिं जेहिं रस मगन तहँ सो मुदित मन मानि । रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि ॥३७१॥ भावार्थ—जो-जो जिस-जिस रसमें मग्न होता है, वह उसीमें संतोष मानकर आनन्दित होता है। परंतु रसके गुण-दोषका विचार करना तो रसिकोंकी रीतिकी पहचान है (अर्थात् रसके गुण-दोषका विचार तो रसिकजन ही करते हैं) ॥३७१॥ सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह । ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥३७२॥ भावार्थ—यद्यपि शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें उजियाला और अँधेरा बराबर रहता है, तो भी विधाताने उनके नाममें भेद कर दिया है। शुक्लपक्षको चन्द्रमाका पोषक (कलाको बढ़ानेवाला) जानकर उसे जगत्में यश दिया अर्थात् यशरूप 'शुक्लपक्ष' नाम रक्खा और कृष्णपक्षको चन्द्रमाका शोषक (कलाओंको घटाने वाला) जानकर उसे अपयश दिया अर्थात् कलङ्करूप 'कृष्णपक्ष' नाम रक्खा ॥३७२॥ कभी-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच । धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच ॥३७३॥ भावार्थ—लोक और वेदतकमें भी भलेका बुरा नाम प्रसिद्ध है। धर्मराजको यम और बिजलीको वज्र कहनेमें किसीको सोच अथवा संकोच नहीं होता ॥३७३॥