भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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दोहावली १३१ (बुरा) ही समझना चाहिये (मरनेपर भी उसे सद्गति नहीं मिलती) ॥३६०॥ नीचा बनकर रहना ही श्रेष्ठ है सासु ससुर गुरु मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ । होनी दूजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ ॥३६१॥ भावार्थ—सास, ससुर, गुरु, माता, पिता और मालिक इत्यादि होना (बड़े बनकर हुक्म चलाना और सेवा कराना) तो सभी चाहते हैं; परंतु जो लोग इनके दूसरी तरफके अर्थात् बहू, दामाद, शिष्य, कन्या, पुत्र और सेवक बनना (नीचे पदमें रहकर आज्ञा मानना और सेवा करना) चाहते हैं, वही सज्जन सराहने योग्य हैं॥३६१॥ सज्जन स्वाभाविक ही पूजनीय होते हैं सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ । गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐं गंडकि सिला सुभायँ ॥३६२॥ भावार्थ—दुष्टलोग बड़े-बड़े कष्ट सहकर तब कहीं प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं; परंतु सज्जनोंको (प्रतिष्ठाप्राप्तिमें) कुछ भी शारीरिक क्लेश नहीं होता। जैसे साधारण पत्थर जब गढ़-छुलकर मूर्तिके रूपमें आते हैं तब पूजे जाते हैं; परंतु गण्डकी नदीके पत्थर (शालग्राम- शिला) स्वाभाविक ही पूजनीय होते हैं ॥ ३६२ ॥ भूप-दरबारकी निन्दा बड़े बिबुध दरबार तें भूमि भूप दरबार । जापक पूजक पेखिअत सहत निरादर भार ॥३६३॥ भावार्थ—देवताओंके दरबारसे भी पृथ्वीके राजाओंके दरबार बड़े हैं; क्योंकि इनमें (राजाओंके दरबारमें) भगवान्के नामका जप