दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ दोहावली करनेवाले और भगवान्की पूजा करनेवाले भी बड़ा भारी अपमान सहते देखे जाते हैं (जो देवताओंके दरबारमें असम्भव है) ॥३६३॥ छल-कपट सर्वत्र वर्जित है बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिय न दिएँ कलेस । बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेश ॥३६४॥ भावार्थ—विना छल-कपटके मिलनेवाली भीख ही उत्तम है, किसीको क्लेश पहुँचाकर भीख नहीं लेनी चाहिये । भगवान्ने वामन- रूप धरकर बलिसे छल किया और इसी बहाने सबको उपदेश दिया (कि छल करना बहुत बुरा है, छल करनेके कारण ही मुझे पातालमें बलिकी द्वारपाल बनना पड़ा है) ॥ ३६४ ॥ भलो भले सों छल किएँ जनम कनौड़ो होइ । श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ ॥३६५॥ भावार्थ—भला आदमी यदि किसी भले आदमीसे छल कर बैठता है तो उसे फिर जन्मभर उससे दबकर रहना पड़ता है । भगवान् लक्ष्मीपतिने वृन्दासे छल किया था, इससे वह तुलसीके रूपमें भगवान्- के सिरपर विराजमान रहती है; और भगवान् वामनजीने राजा बलिसे छल किया, तो उनकी भी वही गति हुई (उन्हें उसका द्वारपाल बनकर रहना पड़ा) ॥ ३६५ ॥ बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि । प्रभुता तजि सब भे तदपि मन की गइ न गलानि ॥३६६॥ भावार्थ—भगवान् वामनजीने अपने मनमें अच्छा समझकर ही देवताओंके कार्यके लिए बलिको छला, फिर अपना स्वामित्व छोड़कर उसके वशमें भी हो गये अर्थात् उसके द्वारपालतक बन गये तो भी [छल करनेके कारण] उनके मनकी ग्लानि नहीं मिटी ॥ ३६६ ॥