भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१२० दोहावली प्रकृतिके अनुसार व्यवहारका भेद भी आवश्यक है नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल । कदरी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल ॥३५४॥ भावार्थ—नीच लोग निरादर करनेसे और बड़े लोग आदर करने- से सुखदायी होते हैं। इस बातको समझनेके लिये केले और बेर तथा कटहल और आमके पेड़ोंकी दशा देखो (केला तथा बेर काटे जाने- पर अधिक फल देते हैं, परंतु कटहल और आम सींचने और सेवा करने पर ही फलते हैं) ॥ ३५४ ॥ अपना आचरण सभीको अच्छा लगता है तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु । तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु ॥३५५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अपना आचरण किसको अच्छा नहीं लगता ? जो नित्य लहसुन खाता है, उसको लहसुनकी दुर्गन्ध नहीं मालूम होती ॥ ३५५ ॥ भाग्यवान् कौन है ? बुध सो बिबेकी बिमलमति जिन्ह कें रोष न राग । सुहृद सराहत साधु जेहि तुलसी ताको भाग ॥३५६॥ भावार्थ—वे पुरुष निर्मल बुद्धिवाले, ज्ञानवान् और बुद्धिमान् हैं जिनका न किसीमें राग (आसक्ति) है, न किसीके प्रति क्रोध (द्वेष) है; किंतु साधुजन जिन्हें सुहृद् (सबका अकारण हितू) कहकर सराहना करते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं वे बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ३५६ ॥